Wednesday, March 30, 2016

व्यथित जीवन ।


विकल व्यथित जीवन
आज हर मनुष्य
वासना जीता
ओर वासना मांगती
निरंतर वैभव पल
अज्ञात आकांक्षा सुख बीच
भयभीत करती
विडंबना भरे अंधकार मय दुख की
नहीं भरोसा स्व पर
दुर्बलताओं मे कैसे करू
अच्छे क्षणो की कामना
आशामयी आस्था
मिट जाती जिन्दगी से
हर पल होता
कातर अशांत अस्थिर
वर्तमान का शुष्क कंठ
भोगता हूँ अतृप्त सा
हर क्षण
ओर अहसासहीन
जीने लगा बेहोश जिन्दगी
स्वप्नवत घीरी
हर ख्वाहिश
रहती अधूरी
नहीं होती कहीं
आकांक्षा पूर्ण
ओर अति
 व्याकुल दशा माँगती
हिसाब सुखो का
अपने हिस्से तमाम संघर्ष
सहने के बाद
अभी नहीं मिला न्याय
ओरो की तरह
कारगुजारी भुगती
सुख निमित्त
स्वप्नवत नहीं टूटती बेहोशी
अंतराल घना बढता जाता
सत्य ओर छलावे बीच
ओर घीरती वासना
निरंतर अब देती चुनौती
समर्पित जीवन की
शायद जीवन अंत दे सके
वासनाओं को विराम
अब निरूद्धेश्य
जीने का मकसद नहीं रहा।
छगन लाल गर्ग ।