सत्य साबित नहीं
संचय हर क्षण
नहीं मुक्ति
बिना संचय के
नहीं रह सकता
संसार
आबाद हैं हम केवल
संचय बदौलत
ऊहापोह भरे हर क्षण
हम स्वयं रचते
अपने स्पंदन निमित्त
ओर देते जाते
पुष्टि अपने गढे को
हाँ सत्य वहीं
जो रचा हमने
हमारी उपलब्धियों का
हर संग्रहण
हमारी रचना
वहीं संसार हमारा
ओर हम निरंतर
बेहोश हुए
संग्रहित करते जाते
भौतिक सुविधा
पद की गरिमा
नहीं हो पाते निवृत्त अंत तक
संग्रह की भूख से
ओर फिर
क्षमताओं की
थकान से शिथिल
पाना चाहते मुक्ति
माया से संसार से
क्या यह होगा
यह प्रश्न मेरा नहीं
हर संसारी का
अंतिम
भाग दौड की संध्या पर
बलात सबल होता
ओर तब बार बार
पश्चाताप होता
कास सृजन कर्ता नहीं होता मैं
रहता सरल मानव स्वभाव में।
छगन लाल गर्ग।