मकसद निर्णीत कला
बनता रहा
अहिस्ता से आज का सृजन
समर्थ सक्षम सत्ताधारी
समाज संस्था ओर समुदाय
निर्मित कर
प्रतिष्ठा पद ओर पैसे की लालसा मे
अहंकारी पदार्थ प्रेमी
खडे घेर चुके जमीं साहित्य सृजन
अभिव्यक्ति की मौलिक अभिव्यंजना
नही रही
आत्मीय चेतन दीप नही जलता
कि रोशनी करे अंधेरे भीतर के
अंधकार के काले बादल
घिरे हृदय गगन
ओर रोशनी की जगह वासना के नद
का जुगनू चमक देता
हर अभिव्यक्ति मे
कमाऊ भाव दशा मे डूबा आज
सृजन का पहिया
नही निकल पाता दलदल से
नियंत्रण से बंधी हमारी अभिव्यक्ति
कैसे कहला सकेगी सृजन सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।
बनता रहा
अहिस्ता से आज का सृजन
समर्थ सक्षम सत्ताधारी
समाज संस्था ओर समुदाय
निर्मित कर
प्रतिष्ठा पद ओर पैसे की लालसा मे
अहंकारी पदार्थ प्रेमी
खडे घेर चुके जमीं साहित्य सृजन
अभिव्यक्ति की मौलिक अभिव्यंजना
नही रही
आत्मीय चेतन दीप नही जलता
कि रोशनी करे अंधेरे भीतर के
अंधकार के काले बादल
घिरे हृदय गगन
ओर रोशनी की जगह वासना के नद
का जुगनू चमक देता
हर अभिव्यक्ति मे
कमाऊ भाव दशा मे डूबा आज
सृजन का पहिया
नही निकल पाता दलदल से
नियंत्रण से बंधी हमारी अभिव्यक्ति
कैसे कहला सकेगी सृजन सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।