व्यक्ति रहना
सीखना होगा
अनंत प्रवाह बहती धार
जीवन नदी की
ओर हर प्रवाह छल भरा
नही होता आत्म सात
जिन्दगी की जरूरत
उभरती ज्वाला सी
निरंतर विशालकाय
ओर घबराहट लिए
नित्य बढता जाता
शान्त दमित करने
नही हो पाता यह
क्षमताओ का दंभ मात्र
नही हकीकत
कि कार सकूं समाधान
नित्य उठती बाधाओ का
जटिलताओ का दौर लिए
टूटता जर्जर हुआ
अब बन गया समन्वयक
लडखडाता
संभलता करता हूँ कोशिश
जिन्दगी प्रवाह को
मिल सके सहारा
विवशता वस
हर सबल से निभाता
विनयशिलता का ढोंग
बन जाता हूँ
जीने लायक व्यक्ति
ओर उग्र हुए अहंकार से
विनय हुआ
लेता जाता छूट मानवता की
ओर स्व त्याग का
ढोंग कर
पाता रहता
अहंकार रस भी
स्पष्ट ही नही
रहा व्यक्ति मैं
सीखना नही आया
व्यक्ति बन जीना
केवल दौहराता हूँ
व्यक्ति होने का नाटक ।
छगनलाल गर्ग ।
सीखना होगा
अनंत प्रवाह बहती धार
जीवन नदी की
ओर हर प्रवाह छल भरा
नही होता आत्म सात
जिन्दगी की जरूरत
उभरती ज्वाला सी
निरंतर विशालकाय
ओर घबराहट लिए
नित्य बढता जाता
शान्त दमित करने
नही हो पाता यह
क्षमताओ का दंभ मात्र
नही हकीकत
कि कार सकूं समाधान
नित्य उठती बाधाओ का
जटिलताओ का दौर लिए
टूटता जर्जर हुआ
अब बन गया समन्वयक
लडखडाता
संभलता करता हूँ कोशिश
जिन्दगी प्रवाह को
मिल सके सहारा
विवशता वस
हर सबल से निभाता
विनयशिलता का ढोंग
बन जाता हूँ
जीने लायक व्यक्ति
ओर उग्र हुए अहंकार से
विनय हुआ
लेता जाता छूट मानवता की
ओर स्व त्याग का
ढोंग कर
पाता रहता
अहंकार रस भी
स्पष्ट ही नही
रहा व्यक्ति मैं
सीखना नही आया
व्यक्ति बन जीना
केवल दौहराता हूँ
व्यक्ति होने का नाटक ।
छगनलाल गर्ग ।