Wednesday, March 16, 2016

क्या हो ।

आयु का उतरार्द्ध
देहिक विडंबनाओं से होता वाकिफ
सरकता जाता ओर नजदीक देह के
मन से भी सचेत हुआ सा
हर अंग प्रत्यंग देता अपनी अपनी
विकल थकान की आह
ओर मैं अनमना सा
स्वभाव लिए करता कोशिश
सुनने की
अनेक व्यथा स्वर उभरते
प्रति अंग विलग गाथा
चाहते सुनाना
जैसे होता रहा हर बार विगत मे
ओर करता रहा शरीर का
एकमेव हुआ अबतक का जीना
अब सुनता तो
पर चेतना सामर्थ्य हीन
प्रबोध पाती अचेतन का
छूटना चाहता जर्जर दशा
असंभव हुआ
उतरार्द्ध में तन का मोह पालना
ओर अब कहना ठीक
विकलता तुम्हारा आज का सत्य
बस भुगतना ही सच
अनंत विनय जोड़ो ओर
करो प्रतीक्षा देखें क्या हो ।
छगन लाल गर्ग ।