Sunday, March 13, 2016

इर्ष्या नही यह।

अनंत आकांक्षा
प्रबल होती जाती मद्देनजर
निगरानी करती
आसपास की जमी
बहुत छोटा लगता अस्तित्व
खुद का बनिस्बत खटकते
लोग बहुत  ऊंचापन लिए
अब नही भाता
पूर्व हृदय समाया अपना घर
कितना दिया अबतक
स्नेह पारावार
घर का हर सदस्य संतोष जीया
खूब पहले
फर्क  आया अभी
जब से विशालकाय भवन
ऊँची दीवारो से
झरोखों की मोहक सुंदर शिल्प लिए
हुआ शोभित बिल्कुल सामने
नही रहा वस मे
खाना पीना सोना
प्रति पल देता रहता संताप
असमर्थ क्षमता की
ओर मन नही मानता असमर्थता अपनी
कांटा बन चुभता अब
विशाल वैवाहिक देता पराया भवन
क्या कहूँ इसे
केवल तृष्णा की भूख
नही कहता
इर्ष्या नही यह फिर क्यो हुआ जाता
जीवन अशांत ।
छगन लाल गर्ग ।