यहां नहीं ठहराव
अनुभूति भिन्नता भम्रदाय
दृष्टिवत प्रत्यक्ष भी
विभ्रांत
हर स्थूल यहाँ
केवल अहसास में
लगता स्थित
बहुत सूक्ष्म भीतर ही भीतर
व्यतीत होता
परिवर्तन के जर्जर अणुकण
पाते बिखरावों की नवीनता
सन्नाटा
इसी बात का
परिवर्तन से
पूर्व की नीरवता
कहती समझ देती
नहीं तुम नहीं
दृढ़ विचारों का ठहराव
जगत शब्द
कहता अपना
अस्तित्व भेद हर पल
आता जाता
हर क्रिया का
आरंभ अंत
निस्सारता मे
सार का भेद
प्रकृति का हर अणु
अनुपमता के मोह
विभ्रम भूल
समझ आता नहीं
निस्सार का सार
अति संकरी
क्षण की चाल
सरिता नीर सा प्रवाह
अनंत रही यात्रा
पहुँच मंजिल पाना
नहीं हाथ
हाथ केवल इतना सा
बहना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग ।
अनुभूति भिन्नता भम्रदाय
दृष्टिवत प्रत्यक्ष भी
विभ्रांत
हर स्थूल यहाँ
केवल अहसास में
लगता स्थित
बहुत सूक्ष्म भीतर ही भीतर
व्यतीत होता
परिवर्तन के जर्जर अणुकण
पाते बिखरावों की नवीनता
सन्नाटा
इसी बात का
परिवर्तन से
पूर्व की नीरवता
कहती समझ देती
नहीं तुम नहीं
दृढ़ विचारों का ठहराव
जगत शब्द
कहता अपना
अस्तित्व भेद हर पल
आता जाता
हर क्रिया का
आरंभ अंत
निस्सारता मे
सार का भेद
प्रकृति का हर अणु
अनुपमता के मोह
विभ्रम भूल
समझ आता नहीं
निस्सार का सार
अति संकरी
क्षण की चाल
सरिता नीर सा प्रवाह
अनंत रही यात्रा
पहुँच मंजिल पाना
नहीं हाथ
हाथ केवल इतना सा
बहना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग ।