नहीं दिखता अंतर
गिर जाता देहिक भेद
साक्षात प्रकट भी
देखती आँखें जब भीतर की
नहीं दिखता अंतर
तुम्हारे मेरे बीच
कि मैं पुरुष तुम नारी
नहीं हृदय धरातल पर
कोई फर्क
या कि विचार सोच
मनन स्तर पर
तुम्हारा मेरा अलग होना
होता हो साबित
भावनाओं की तरंगों बीच
गुम जाते हम
नहीं रहते स्त्री पुरुष
एकरसता मे विलय हो जाते
सारे भेद
पर जब घेरती वासना
तुम्हें या कि मुझे
वेगमय तरंगे लेती जन्म
काम वासना की
तुम बन जाती प्रथक
मैं बन जाता प्रथक
हम बन जाते शरीर
अलग अलग ध्रुव लिए
ओर काम का ज्वार
आँधी बन उजाडता
विचारों का गुम्फन
नहीं तब हम
हो जाते शरीर केवल
तृष्णा का धुआँ
उठता जाता
ओर ध्वंस होती जाती
सीमाएँ
नैतिकता की
रह जाते वासना के पुतले
इस क्षणिक सत्य
संतुलन पर आश्रित हैं मानवता।
छगन लाल गर्ग।