Thursday, March 10, 2016

मंथन का सच ।


हर बात कहने से पहले
सोचना होगा
बडे होने का मापदंड
विश्लेषण पश्चात का संश्लेषण
पहले पचाना होगा
बिना स्वाद का
अहसास किये
जेसा भी बिना मुँह बिगाडें
तुला हुआ सच
समय की धारा पर नही
आवश्यकता की ऑच पर
पकने दो
ओर यदि फिर भी
कहना विवशता बन जाये
तो कहो
यह कहा तुम्हारा
तुम्हारे कारण नही
सुना जाता
अनुभव की दीर्घा भी नही
आधार
या बडे होने का
मान मन्वल भी नही
केवल इस गरज
कि कुछ उपाय
नही ओर
तुम्हें झुठलाने के
ओर हो सकने की
गुंजाइश छीपी
फायदा
यही कारण
तुम कर सकते हो तस्सली
अपने बडप्पन की
अवशेष जीवन का
अब यही
काल्पनिक ही सही
सहारा तो है ।
छगन लाल गर्ग ।