Tuesday, March 1, 2016

शून्य दृष्टि ।

नहीं पाता कहीं
शून्य दृष्टि सत्य भरी
परम ज्ञानी
बखान करता
अपना संचित ज्ञान
तत्कालीन सत्य से अछूये
बदलाव का सत्य
नहीं रहता पूर्वाग्रही
भेद आ जाता
समय की सापेक्षता का
ओर हर ज्ञानी बहुत भरा भरा
हजार हजार विचारों से
ओर करता जाता दावा
अपने होने का
अपने विचारों की सत्यता का
असलियत देखे भी कैसे
एक पर्दा ढक देता
सत्य साक्षात
पूर्वाग्रह का
ओर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता
चिल्लाता जाता अधिक जोर देकर
समूह ओर झुंड बनाकर
अंधी भीड़ के साथ
नहीं हैं सत्य के साक्षात्कार की गरज
सत्य से असत्य को बडा खतरा
नहीं करता स्वीकार
सत्य
पूर्वाग्रह लिए हजारों  विचारों  के साथ
भरी ऑखो से चिल्लाता जाता
अपना दावा
नहीं आज के युग मे
साक्षात सत्य से साक्षात्कार को
शून्य  दृष्टि ।
छगन लाल गर्ग ।