जानता हूँ कि
मैं हूँ
केवल इसी कारण
जीवित कि
रहता हूँ भयभीत
घर मे पत्नी व बच्चों से
गली के दादा से
गाँव मे पंच सरपंच से
पटवारी ओर पुलिस थाने से
सुबह से शाम
जहाँ कहीं भी जाता मजूरी
इनके कृपा से पाता हूँ काम
सारी उम्र कट गयी
इनकी बेमोल सेवा मे
अच्छा हैं
तीज त्यौहार पर बुलाते काम लिए
देते फटे पुराने कपड़े
निकल जाते बारह महिने
पर दशहत हर पल रहती
कब किस भूल पर
हो जाये नाराज
फिर अंजाम अकल्पनीय रोगटें करता
घर वाले तब तक मेरे
जब तक बाहर से रहता भयभीत
वैसे कहते
खूब करते मुझसे प्रेम
अब नहीं समझ पाता
भय ओर प्रेम का अजूबा
एक साथ
मेरे जीवन मे रहा कैसे
भयभीत जीवन मे कहां प्रेम
कब मिटेगा
सामान्य जन का भय
ओर समझ आयेगा
आजाद भारत का प्रजातंत्र ।
छगन लाल गर्ग।