Tuesday, March 15, 2016

चिंकनाई।

आवाज के साथ
दर्द की चीरती सी लकीर
उभरती टखनों में
रूकता हूँ दर्द सारोबार
चक्कर खाता
गिरने से संभलता लेता सहारा
लकड़ी के  डंडे का
अब आगे चलना
सामर्थ्य नहीं
सोचता बेठता हूँ
निर्मित दीवार की
नीव उठी ऊंची
कैसे होगा आगे निश्वास उठती
रोकता हूँ
दृष्टि डालता बेतहासा दौडते
सडक पर वाहन
सिरहन ले लेता उठता
चिकनाई के अभाव मे
घुटनों का दर्द रहेगा
याद आता डाक्टर का कथन
झटक लेता हूँ विचार
ओर झटका देता देह
बढता हूँ आगे
बदला लेता देह से उसके
आलस्य गुजरे विश्राम का।
छगन लाल गर्ग ।