नहीं इतराता
अवगुण बहुतेरे संचित
चल रहा जीवन
कला समझ गया
श्वास लेने की
नहीं ऐतराज मेरा
किसी को
कि क्यों जिंदा मैं
झुकता हूँ हर जगह
नहीं करता कभी ऐंचातानी
नही बांध पाया कोई
मुझे
स्वच्छन्द रहा जीवन
केवल मात्र
नहीं अवगुण
कोई एक
अनेको रखता अवगुण
जीवित रहने निमित्त
हो जाता हूँ
हर जगह समर्पित
नहीं रखता दुराव अपनों
ओर परायों बीच
चला जाता हूँ
वहां भी ऐसे स्थलों में भी
जहां समझा जाता
समर्पण को गलत
आदमियत की
अंतिम गिरावट दशा
मानते करते विरोध
जाता हूँ वहां भी
सुनता हूँ हृदय से
इस कारण कि कितना सत्य
उनकी बातों की सत्यता में
विश्लेषण बोध की काबलियत
करता हूँ पैदा अपने में
बौद्धिक कसरत की क्षमता
शायद आ सके
करता कोशिश संभव लगता
आंशिक समझ से पा सकूँ
कुछ सत्य
कोन जाने मैंरा समर्पित जीवन
सत्य समर्पण का मार्ग
बन सके मोक्ष मार्ग ।
छगन लाल गर्ग ।