अंत मत कहो
नहीं रूकता सृजन
अदृश्य
गूँथता जाता चेतन
साकार दृश्य संभावित
संसार की यही प्रवृत्ति
असंभव देखा सुना
संभव होते
ओर महसूस हुआ जड
फिर श्वास लेते
होते हैं करिश्में
आधारित हर क्रिया कर्ता के
ओर वह
कोई ओर नहीं फक्त मानव
जो दंभ भरता
अपनी प्रगति पराकाष्ठा
अब हर क्षेत्र
करता जाता हस्तक्षेप
शायद बनना चाहता निर्माता
खुद अपना
नहीं जानता जब कदम
लेंगे रफ्तार
अस्मिता अपनी ढूँढते
नहीं पा सकेगा
अस्तित्व की चेतन दशा
शायद विकृत मानसिकता का
विशिप्त किनारा आ चुका
संभलने का उपाय
विवेक नही ज्ञान नहीं
अबोध दशा ही
आखिर उपाय मानवता का।
छगन लाल गर्ग।