अखरने लगती हर बात
तत्वावधान किसी ओर के
सुनाई जाती चाह कर
पास आकर
मेरी प्रकृति से मेल खाती
ओर तब सुनाने वाले मेरे अपने
सुनाते जाते तल्लीन हुए
चटखारे लेते
कही हथोडे से तोडते जाते
भीतर संजोया बचा खुसा केवल
जिन्दा रहने लायक स्वाभिमान
मेरा शिथिल श्वास लेते को
ओर मेल नही कर पाता
दर्द भरी अभिव्यक्ति तक
कही हल्कापन न झलके
सुना अनसुना दर्द बेअसर रहे
करता जाता अस्वाभाविक चेष्टाऐ
ओर नही होती तस्सली
अपने स्वाभाविक के तमाम उपाय
हुए जाते नकारा
जब हंसी के प्रबल ठहाके लगते
छोटे बडो के सामूहिक
अब हुआ पक्का
उम्र के साथ इज्जत भी
धीरे धीरे विलय होती जाती
उपेक्षित वातावरण मे
अंतिम सकारात्मक प्रयास
केवल शुद्धता भरा मौन
यही सार यही जीवन परिणाम
जिन्दगी भर की उपार्जित कमाई का ।
छगन लाल गर्ग ।
तत्वावधान किसी ओर के
सुनाई जाती चाह कर
पास आकर
मेरी प्रकृति से मेल खाती
ओर तब सुनाने वाले मेरे अपने
सुनाते जाते तल्लीन हुए
चटखारे लेते
कही हथोडे से तोडते जाते
भीतर संजोया बचा खुसा केवल
जिन्दा रहने लायक स्वाभिमान
मेरा शिथिल श्वास लेते को
ओर मेल नही कर पाता
दर्द भरी अभिव्यक्ति तक
कही हल्कापन न झलके
सुना अनसुना दर्द बेअसर रहे
करता जाता अस्वाभाविक चेष्टाऐ
ओर नही होती तस्सली
अपने स्वाभाविक के तमाम उपाय
हुए जाते नकारा
जब हंसी के प्रबल ठहाके लगते
छोटे बडो के सामूहिक
अब हुआ पक्का
उम्र के साथ इज्जत भी
धीरे धीरे विलय होती जाती
उपेक्षित वातावरण मे
अंतिम सकारात्मक प्रयास
केवल शुद्धता भरा मौन
यही सार यही जीवन परिणाम
जिन्दगी भर की उपार्जित कमाई का ।
छगन लाल गर्ग ।