Friday, March 18, 2016

अधूरापन ।

कालातीत कर्मरत वर्तमान
तल्लीन हुआ अनवरत
संपूर्णता पाने
अतिशय आक्रांत अस्तित्व
दांव लगाता जाता
अस्मिता जीवन भर संग्रहित
मानव होने की पूँजीगत
मात्र यही लक्ष्य
मिट जाये जीवन का अधूरापन
नहीं हारता अंतिम श्वास
ललक का उफान वही
शिथिल अस्तित्व से पृथक
कामना का चेतन पुँज
जलाता जाता
नव अंकुरित पल्लवों को
इठलाती अबोध कलियों में
चेतन बीज जीवन के
लेना हैं लक्ष्य का ठौर
एक दिन
न रहे भीतर भाव मानवता
कि अभी व्याप्त हैं
अति भीतर मेरे अधूरापन।
छगन लाल गर्ग ।