अभी नही हुई देरी
बुढापा घेरने दो
अच्छा हैं अहो भाग्य भी
भीतर बहुत रिक्त हूँ
इसे मत समझो देरी
उठ रहा कुछ अज्ञेय स्वर
शायद ले रहा आकार वह गीत
तरसते जीवन गाने को
सदियो से जन्मों से
नही आ पाता होठो तक
यह चाहता बहना रागिनी बन
कहां संजोई जीवन भर
कि निकले कंठ से राग बन
होने दो रूपान्तरण
बहने दो आँखों से रूदन की रागिनी बन
स्वीकार लेंगे मेरे परम
प्रसाद समझ मेरी
अब समझ का समय यह
अबोध रहना सिखाना होगा माया से
बहुमूल्य हैं उतरार्द्ध का समय
यह आखिरी सौपान परम साक्षात्कार
होने का अहसास अब ना कर
अधीर प्राणों का धैर्य रश्मिमय
महा अंबर विराट का स्नेह आमंत्रण
केवल मेरे लिए
नही हुई देरी सजावट कर तो लूँ
परम से महा मिलन निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।
बुढापा घेरने दो
अच्छा हैं अहो भाग्य भी
भीतर बहुत रिक्त हूँ
इसे मत समझो देरी
उठ रहा कुछ अज्ञेय स्वर
शायद ले रहा आकार वह गीत
तरसते जीवन गाने को
सदियो से जन्मों से
नही आ पाता होठो तक
यह चाहता बहना रागिनी बन
कहां संजोई जीवन भर
कि निकले कंठ से राग बन
होने दो रूपान्तरण
बहने दो आँखों से रूदन की रागिनी बन
स्वीकार लेंगे मेरे परम
प्रसाद समझ मेरी
अब समझ का समय यह
अबोध रहना सिखाना होगा माया से
बहुमूल्य हैं उतरार्द्ध का समय
यह आखिरी सौपान परम साक्षात्कार
होने का अहसास अब ना कर
अधीर प्राणों का धैर्य रश्मिमय
महा अंबर विराट का स्नेह आमंत्रण
केवल मेरे लिए
नही हुई देरी सजावट कर तो लूँ
परम से महा मिलन निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।