Friday, June 17, 2016

बुढापा

अभी नही हुई देरी
बुढापा घेरने दो
अच्छा हैं अहो भाग्य भी
भीतर बहुत रिक्त हूँ
इसे मत समझो देरी
उठ रहा कुछ अज्ञेय स्वर
शायद ले रहा आकार वह गीत
तरसते जीवन गाने को
सदियो से जन्मों से
नही पाता होठो तक
यह चाहता बहना रागिनी बन
कहां संजोई जीवन भर
कि निकले कंठ से राग बन
होने दो रूपान्तरण
बहने दो आँखों से रूदन की रागिनी बन
स्वीकार लेंगे मेरे परम
प्रसाद समझ मेरी
अब समझ का समय यह
अबोध रहना सिखाना होगा माया से
बहुमूल्य हैं उतरार्द्ध का समय
यह आखिरी सौपान परम साक्षात्कार
होने का अहसास अब ना कर
अधीर प्राणों का धैर्य रश्मिमय
महा अंबर विराट का स्नेह आमंत्रण
केवल मेरे लिए
नही हुई देरी सजावट कर तो लूँ
परम से महा मिलन निमित्त
छगन लाल गर्ग

जीएं तपिश

कब तक जीएं तपिश
ओरों के लिए
केवल इसी कारण
शरीर संबंध मूर्त नही अब
बन गये सूक्ष्म
गहरी संवेदना से जुडकर
जलने लगा हूँ अमूर्त
बाह्य आवरण नही ढक पाता
दारूण दृश्य भीतर का
देने लगा दुर्गंध जलने की
श्वास संग पहुंचने लगी
हर जीवंत के तन
मेरी अनकही दशा
अब नही उपाय रहे रहस्य
अस्मिता संघर्ष घना जटिल
जलना होगा निशब्द
स्वाभिमान होने का देता दंश
ओर यही होना साबित करता
जीवन का ध्येय
परमार्थिक भाव धारा स्त्रोत उदगम
स्वयं विकार निवृत्ति से
तपिश पाकर जलन से फूटता
शीतल स्नेह पारावार
जो करता पावन स्व ओर पर का भेद
जीवन हो जाता जीवंत
स्थूल का विद्रोह ही
जीवन अस्मिता का सार तत्व
यही कारण
यही करण ओर यही धरम
वेदना की टीस को कहने दो
निरंतर अबाध
कब तक जीएं तपिश
छगन लाल गर्ग

मौन अवसर

नही फर्क पडता
तुम किसके साथ
तवज्जो इस बात पर
तुम्हारा अपना वजन कितना
केवल पिचल्लगू तो नही
संख्या या अस्तित्व रक्षा निमित्त
तुम्हारा वजूद तो नही
यह माना कि आज बहुत चर्चित हो
अपने समान स्तर पर
कुछ आदरणीय हो
अब रखना पडता हैं ध्यान
हर शब्द तुम्हें कहने से पहले
यह बिल्कुल अलग बात
कितनी कद्र करते हम
केवल तुम्हारी संगत सत्ता पक्ष से
नही पता हमे तुम्हारा पायदान
पर इससे क्या
खलल डालने मे समर्थ हो सकते तुम
हमेशा सत्ता पक्ष के कच्चे होते कान
बस यही कारण
हम बख्शते हैं इज्जत तुमको
पर सच कहूँ तुमसे डर लगता
अंतराल गहराई बढती जाती
नही कह सकता सच्चाई दिल की
यह विषय रहने दो हमारा
तुम्हारे सत्य की समीक्षा कर लेंगे हम
एकांत मे एक दूसरे के कानों में
हम सामान्य व्यक्तियों को अब
रहना होगा मौन अवसर मिलने तक
छगन लाल गर्ग