नही होता मैं
विलीन हो जाता अस्तित्व
नही पता होता क्या
केवल अनुभूति की गहनता घिरा
होता भी हूँ शायद
जब डूबता हूँ तुझमे
अदृश्य रह जाता दृश्य होते भी
अनुभव नही करता मै स्वयं को
ओर तुम गहराई से घूरते हो मुझे
साक्षात पदार्थ की भांति
जब तक भाव नही लेते आकार
शब्द बनकर
कहां होता हूँ मैं
अनुभूति ओर अस्तित्व का लय
मिलते ही होने लगता शब्द सृजन
अब नही दखल मेरा
जहां समझदार पाते विसंगती
जीवन ओर कविता बीच
पर अदृश्य अचेतन रंजित बहता
कविता की ओर
शायद गहरे मे कविता नही मानव कृत।
छगन लाल गर्ग ।
विलीन हो जाता अस्तित्व
नही पता होता क्या
केवल अनुभूति की गहनता घिरा
होता भी हूँ शायद
जब डूबता हूँ तुझमे
अदृश्य रह जाता दृश्य होते भी
अनुभव नही करता मै स्वयं को
ओर तुम गहराई से घूरते हो मुझे
साक्षात पदार्थ की भांति
जब तक भाव नही लेते आकार
शब्द बनकर
कहां होता हूँ मैं
अनुभूति ओर अस्तित्व का लय
मिलते ही होने लगता शब्द सृजन
अब नही दखल मेरा
जहां समझदार पाते विसंगती
जीवन ओर कविता बीच
पर अदृश्य अचेतन रंजित बहता
कविता की ओर
शायद गहरे मे कविता नही मानव कृत।
छगन लाल गर्ग ।