Tuesday, June 14, 2016

मेरे अपने

कहां होते मेरे अपने
मूर्त जज्बात
जिन्हें जिस्म बनकर नही
नही भोगा कभी
केवल खोता रहा संपूर्ण
डूबता हो जाता अदृश्य
तुम जगाते कब मुझे
कि जागूं मैं
ओर जी सकूं शरीर बनकर
एक अहसास अंतः स्फूर्त
मूर्त से बेखबर
अमूर्त सूक्ष्म तरंग संग
वैभव पाता रहा आत्मा संग
लेता हिचकोले
रमणीय रसायन डूबा
आह क्या नाम दूँ इसे
नही समा सकता शब्दों मे
मेरा आनंद
बदलते पहेलु सा दिखाता
माया की हर अदा
ओर गुम होने लगता हूँ मैं
ओर तब मैं
नही हो पाता खुद का
हो जाता अज्ञात विवर का
शून्य स्वर हूँ अब
नही अर्थ दे पाती भाषा
ओर यही कारण
अनेक बेबूझ पल
दृश्य मूक पर मुखर हुए
होते हैं विलय मुझमे
ओर स्मृति आगार बनी
अचेतन की
निश्चित हुआ जाता अब
नही राह कि लौटना हो
विगत की ओर
स्पंदन की टीस विरह बनी
मत दो मुझे मुस्कान
चेतना की
अदृश्य अमूर्त अहसास
मेरे अपने
जहां पाता हूँ मैं स्वयं साक्षात
अस्तित्व अपना
तुम्हारी परछाई से दूर
मुझे मेरा जीवन जीने दो
छगन लाल गर्ग