कहना तो पडेगा
भीतर का सत्य
जो यथार्थ जीवन
ढकता झुठलाता
भ्रमित सा जीता हूँ
यह सच कभी कभी
हिलाता हैं आत्म चेतना के दीये
बूझते धून्धले जीवन का कडवा अनुभव
जीता जाता अबूझ जिन्दगी
जो सत्य अस्वीकारता
करता जाता उपहास परिपक्व जिन्दगी का
बूरा तो हैं पर कहना होगा
अवस्था का अंदाज जान बूझ
जीते हैं हम जब अपरिपक्व जिन्दगी
तन की तरावट बनाते हैं
बनावट के साधन प्रसाधनो से
ओर होने का दंभ भरते
जो नहीं इस वक्त
गुजरा समय बरकार रखने के
खोजते जाते नित नये उपाय
ओर हो जाते हैं अहसासो के नकली स्तम्भ
भीतरी ऊर्जा के स्त्रोतो की करते जाते
बाहरी आवरणो से आपूर्ति
यह सच छूपाये
क्या जीवन सार्थक यथार्थ से
छलावा नहीं होगा
देखा देखी का यह खेल
सभ्य होगा
पर सुसंस्कृत कैसे कहूँ
दिखता नहीं
दृश्य धून्धला जाते हैं
रोशनी की असली परख का समय
रंग बिरंगे चश्मो से ढकना
ओर सौन्दर्य निखारना
कैसे कहूँ यथार्थ देखता हूँ
मन के सौन्दर्य के दीदार का पल
बाहरी चकाचौंध बीच लुटाना
सामर्थ्य का दीवालियापन ही हैं
सौन्दर्य की परिपक्वता की उम्र
निरपेक्ष सत्य के उदात को देखने
एक रस होने मे हैं
इच्छा का सौन्दर्य कभी हुआ
नहीं मेरे मन
ठावस पायी जिन्दगी का सौन्दर्य
कंचन सा तपा
निखरा हुआ अलौकिक
वासनाओ का दमन
मन की गति का संगम
मात्र यही उम्र हैं
जहां श्रद्धा द्वार प्रभु खोलते हैं ।
छगन लाल गर्ग।
भीतर का सत्य
जो यथार्थ जीवन
ढकता झुठलाता
भ्रमित सा जीता हूँ
यह सच कभी कभी
हिलाता हैं आत्म चेतना के दीये
बूझते धून्धले जीवन का कडवा अनुभव
जीता जाता अबूझ जिन्दगी
जो सत्य अस्वीकारता
करता जाता उपहास परिपक्व जिन्दगी का
बूरा तो हैं पर कहना होगा
अवस्था का अंदाज जान बूझ
जीते हैं हम जब अपरिपक्व जिन्दगी
तन की तरावट बनाते हैं
बनावट के साधन प्रसाधनो से
ओर होने का दंभ भरते
जो नहीं इस वक्त
गुजरा समय बरकार रखने के
खोजते जाते नित नये उपाय
ओर हो जाते हैं अहसासो के नकली स्तम्भ
भीतरी ऊर्जा के स्त्रोतो की करते जाते
बाहरी आवरणो से आपूर्ति
यह सच छूपाये
क्या जीवन सार्थक यथार्थ से
छलावा नहीं होगा
देखा देखी का यह खेल
सभ्य होगा
पर सुसंस्कृत कैसे कहूँ
दिखता नहीं
दृश्य धून्धला जाते हैं
रोशनी की असली परख का समय
रंग बिरंगे चश्मो से ढकना
ओर सौन्दर्य निखारना
कैसे कहूँ यथार्थ देखता हूँ
मन के सौन्दर्य के दीदार का पल
बाहरी चकाचौंध बीच लुटाना
सामर्थ्य का दीवालियापन ही हैं
सौन्दर्य की परिपक्वता की उम्र
निरपेक्ष सत्य के उदात को देखने
एक रस होने मे हैं
इच्छा का सौन्दर्य कभी हुआ
नहीं मेरे मन
ठावस पायी जिन्दगी का सौन्दर्य
कंचन सा तपा
निखरा हुआ अलौकिक
वासनाओ का दमन
मन की गति का संगम
मात्र यही उम्र हैं
जहां श्रद्धा द्वार प्रभु खोलते हैं ।
छगन लाल गर्ग।