करता हूँ प्रयत्न खूब
गंदगी जीने के बाद
शुद्धता का
ओर इस निमित्त सारे उपाय
तन से होते शुरू
दिनचर्या की पुस्तक
रखता हूँ सामने
कुछ ना समझ आने लायक
नियम आचरण
लिख रखे मेरे ठीक सामने
पलंग की दीवार पर
हर क्षण नजरों के सामने दिनचर्या
आत्मसात करता लेता हूँ आचरण मे
जरूर परेशान हूँ थोडा
पर इज्जत मिलने लगी कुछ
बदलाव लाया हूँ वस्त्र भी
अब पहनता हूँ ढीले ढाले
बाहर बाहर खूब कर ली तैयारी
निर्मलता निमित्त
अब गहरी अडचन भीतरी
यह नियंत्रित करने मे लगता जाता
पूरा बल
मृत्यु से संघर्ष की
जितनी करता व्यक्ति
ऐचांतानी जीने के लिए
ठीक वैसी ही दशा हैं मेरी
पर मन का घोडा
नही होता वसीभूत
शायद नही होगा
क्षमता का आकलन हो चुका
नही जीत पाया तृष्णा मद से
ओर अब थका हारा मायूस
शांत हूँ
छोड दिया
तन मन का शुद्धिकरण
विश्रांति मय
थिर प्रतिक्रिया विहीन
बडी अजीब दशा
झूम उठा हूँ मैं
शांत निश्छल
अकर्मण्यता अब भाने लगी
समझ आने लगा सत्य
उस परम सत्य निमित्त
अभ्यास नही
खाली होना पडता है
क्रियाओं से
ओर खालीपन की विरानता मे
उभरते हैं नाद
अनहद के
दिव्य अलौकिक
रसमय डूबती अस्मिता संग ।
छगन लाल गर्ग ।
गंदगी जीने के बाद
शुद्धता का
ओर इस निमित्त सारे उपाय
तन से होते शुरू
दिनचर्या की पुस्तक
रखता हूँ सामने
कुछ ना समझ आने लायक
नियम आचरण
लिख रखे मेरे ठीक सामने
पलंग की दीवार पर
हर क्षण नजरों के सामने दिनचर्या
आत्मसात करता लेता हूँ आचरण मे
जरूर परेशान हूँ थोडा
पर इज्जत मिलने लगी कुछ
बदलाव लाया हूँ वस्त्र भी
अब पहनता हूँ ढीले ढाले
बाहर बाहर खूब कर ली तैयारी
निर्मलता निमित्त
अब गहरी अडचन भीतरी
यह नियंत्रित करने मे लगता जाता
पूरा बल
मृत्यु से संघर्ष की
जितनी करता व्यक्ति
ऐचांतानी जीने के लिए
ठीक वैसी ही दशा हैं मेरी
पर मन का घोडा
नही होता वसीभूत
शायद नही होगा
क्षमता का आकलन हो चुका
नही जीत पाया तृष्णा मद से
ओर अब थका हारा मायूस
शांत हूँ
छोड दिया
तन मन का शुद्धिकरण
विश्रांति मय
थिर प्रतिक्रिया विहीन
बडी अजीब दशा
झूम उठा हूँ मैं
शांत निश्छल
अकर्मण्यता अब भाने लगी
समझ आने लगा सत्य
उस परम सत्य निमित्त
अभ्यास नही
खाली होना पडता है
क्रियाओं से
ओर खालीपन की विरानता मे
उभरते हैं नाद
अनहद के
दिव्य अलौकिक
रसमय डूबती अस्मिता संग ।
छगन लाल गर्ग ।