Wednesday, June 15, 2016

कमनीय रूप

यह कमनीय रूप
नही छोडता
निरंतर नव ताजगी लिए मुस्कान देते
झकझोर लेते तुम
हिल मिल गत्यात्मक बन रेंगता हूँ तुम्हारी ओर
मेरे मोहाशक्त सौंदर्य बस केवल मेरे रहो तुम
नही देख सकता कहीं ओर
केवल मेरी दुनिया के रहो दीपक
उजाला तुम्हारा न करे रोशन
ओर की दुनिया
बडा अस्थिर हो जाता जब रहते ओझल
नही लगता मन कही जब होता विलग
कैसा जादू तुम्हारा
संसार की खूबसूरती केवल तुम्हारी
तुम्ही कारण हो
कि ठहरा तनिक सौंदर्य संसार का
अन्यथा यह संसार मात्र तपता रेगिस्तान
हमे चलना होता नंगे पाँव
केवल तुम्हारे सौंदर्य छाया की शीतलता
मिटाती ताप संताप ज्वाला युगो की
मेरे साथी चलो आओ ना दो साथ
उष्ण उर्मिमय जीवन कर दो स्निग्ध शीतल
सुरभित यशस्वी मदांध सा
कुछ मत कहो
वासना नेह नदी नद संगम बन जाने दो
विशाल गहराई अज्ञेय स्नेह मे
वासना नद डूबना चाहता
क्या रोकोगे अब मित मेरे
नही मत करो यह पापमय प्रयास रहने दो
शिथिल होता तुफान होने दो
मीठी नेह रसधार बरसात की पृष्ठभूमि हैं यह
मेरे मित समा जाने दो द्वेत स्थूल
सूक्ष्म नेह महासागर मिलन बन रहा अद्वैत
मेरे कमनीय नेह निभाओ नेह ।
छगन लाल गर्ग ।