केवल शब्द नही
सुनना चाहता
खूब मिल लिया
शब्दो से
अब नही दे पाते ऊर्जा
शब्द अपनी
शिष्टाचार से मंजे सुधरे
सभ्य अदाओ से
लुभाते मुस्काते तुम देते हो
परिमार्जित शब्द
नही मर्म संवेदना से
उपजे
कि बीज विलुप्त हुए
पाया हो शब्द का अंकुर
नही यह नही
दूर तक कही कुछ स्पर्श
या गंध का अंश भी नही
कि उपजे हो विशुद्ध
हृदय स्पंदन का महीन सा कंपन
भी नही
कैसे करूँ मैं आत्मसात
शब्द कविता नही
भाव का स्पंदन बसती हैं
मानव मन की रागिनी
ओर तब नही होता दुराव
भाव ओर शब्द का
न बचता शब्द
न बचता भाव
बच जाती केवल कविता
दयनीय दशा दोनो की
विनती मेरी अब
इन्हे
विलय हो जाने दो
बनने दो ना कविता ।
छगनलाल गर्ग ।
सुनना चाहता
खूब मिल लिया
शब्दो से
अब नही दे पाते ऊर्जा
शब्द अपनी
शिष्टाचार से मंजे सुधरे
सभ्य अदाओ से
लुभाते मुस्काते तुम देते हो
परिमार्जित शब्द
नही मर्म संवेदना से
उपजे
कि बीज विलुप्त हुए
पाया हो शब्द का अंकुर
नही यह नही
दूर तक कही कुछ स्पर्श
या गंध का अंश भी नही
कि उपजे हो विशुद्ध
हृदय स्पंदन का महीन सा कंपन
भी नही
कैसे करूँ मैं आत्मसात
शब्द कविता नही
भाव का स्पंदन बसती हैं
मानव मन की रागिनी
ओर तब नही होता दुराव
भाव ओर शब्द का
न बचता शब्द
न बचता भाव
बच जाती केवल कविता
दयनीय दशा दोनो की
विनती मेरी अब
इन्हे
विलय हो जाने दो
बनने दो ना कविता ।
छगनलाल गर्ग ।