Wednesday, June 15, 2016

अपदस्थ

अपदस्थ हो चुके सार्थक शब्द अब
नही मिलता अर्थ क्रियाओं से शब्दो का
क्रियाओं करती बलात्कार शब्दो से
ओर खोते जाते अपनी मौलिक संरचना का सच
शब्दों की टकसाल पर नही पहरा सत्य का
बेहिसाब बेसुमार अज्ञेय संग्रहण कर्ता लुटेरे
खेलते जाते मर्जी माफिक स्वार्थ का खेल
शब्दों से ओर शब्द
हताश उदास बेअर्थ विपरीत सांचे मे ढाले जाते
काटे जाते अपंग ओर खंडित अस्तित्व साथ
खोते जाते शब्द अपनी मौलिकता
खुरदरे अनभयस्त कठोर हाथों का शिकंजा
ओर कोमलकांत भावों के महीन सूक्ष्म तरंगो से
शब्द नही रहे अपने स्वभाव मे
हो चुके अपदस्थ खो चुके अर्थ अपना
कारण मात्र इतना कि अब बिकने को
बाजार लाया गया हैं शब्दों को
ओर प्रतिष्ठा के लालची अयोग्य सामर्थ्यवान
खरीदने लगे हैं शब्दों को आभूषणों की माफिक
केवल आडंबर की सुरभि प्रचार निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।