अपदस्थ हो चुके सार्थक शब्द अब
नही मिलता अर्थ क्रियाओं से शब्दो का
क्रियाओं करती बलात्कार शब्दो से
ओर खोते जाते अपनी मौलिक संरचना का सच
शब्दों की टकसाल पर नही पहरा सत्य का
बेहिसाब बेसुमार अज्ञेय संग्रहण कर्ता लुटेरे
खेलते जाते मर्जी माफिक स्वार्थ का खेल
शब्दों से ओर शब्द
हताश उदास बेअर्थ विपरीत सांचे मे ढाले जाते
काटे जाते अपंग ओर खंडित अस्तित्व साथ
खोते जाते शब्द अपनी मौलिकता
खुरदरे अनभयस्त कठोर हाथों का शिकंजा
ओर कोमलकांत भावों के महीन सूक्ष्म तरंगो से
शब्द नही रहे अपने स्वभाव मे
हो चुके अपदस्थ खो चुके अर्थ अपना
कारण मात्र इतना कि अब बिकने को
बाजार लाया गया हैं शब्दों को
ओर प्रतिष्ठा के लालची अयोग्य सामर्थ्यवान
खरीदने लगे हैं शब्दों को आभूषणों की माफिक
केवल आडंबर की सुरभि प्रचार निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।
नही मिलता अर्थ क्रियाओं से शब्दो का
क्रियाओं करती बलात्कार शब्दो से
ओर खोते जाते अपनी मौलिक संरचना का सच
शब्दों की टकसाल पर नही पहरा सत्य का
बेहिसाब बेसुमार अज्ञेय संग्रहण कर्ता लुटेरे
खेलते जाते मर्जी माफिक स्वार्थ का खेल
शब्दों से ओर शब्द
हताश उदास बेअर्थ विपरीत सांचे मे ढाले जाते
काटे जाते अपंग ओर खंडित अस्तित्व साथ
खोते जाते शब्द अपनी मौलिकता
खुरदरे अनभयस्त कठोर हाथों का शिकंजा
ओर कोमलकांत भावों के महीन सूक्ष्म तरंगो से
शब्द नही रहे अपने स्वभाव मे
हो चुके अपदस्थ खो चुके अर्थ अपना
कारण मात्र इतना कि अब बिकने को
बाजार लाया गया हैं शब्दों को
ओर प्रतिष्ठा के लालची अयोग्य सामर्थ्यवान
खरीदने लगे हैं शब्दों को आभूषणों की माफिक
केवल आडंबर की सुरभि प्रचार निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।