भरती नथुने श्वास
भीतर जाती तन शिराओं संग
नही करता कोई प्रयास
स्वक्रिय कर्म तन का
ओर यह क्रिया
नही अधीन मेरे कि आरंभ अंत का
श्रेय मिले
ठीक यही गति मेरे व्यतीत क्षणों की
आये भी गये भी
नही वश रहा
जीवन यात्रा के समय पर
कहां से लाऊँ अतीत
विगत समय विलुप्त हुआ
लेकिन अमिट दर्द देता गया
अपनी स्मृतियों के स्नेहिल तार
छोड गया वर्तमान संग
कैसा यह स्थूल सूक्ष्म का बेबूझ खेल
अंश भर मति से विराट का ज्ञान
नही संभव
पर सत्य की यात्रा
केवल वर्तमान संग क्यों
अतीत अछूता भी निर्लिप्त भी
व्यतीत संग
क्या व्यतीत होता सत्य
जीवन की तरह
शायद नही जीवन सत्य
एक बेबूझ अज्ञात यात्रा
निर्धारित समय की
ओर निर्धारण की क्षमता भी
योग्य नही जीवन
ले सके हिसाब
सुख दुख पलट जाना
नही नियंत्रण स्वयं
जीवन तो मात्र
यथार्थ स्थूल अभिनय का भ्रम
शायद मायिक स्वप्निल
सम्यक यात्रा
अनाम अकाम की अभिनय शाला
यहां नही गहराई दिव्य की
अनंत सी
नही क्षणिक यात्रा नही बनी
कि न बचा जाये रति भर भी
कि डूबना हो सके सरिता बन
महा सागर अनंत तल तक ।
छगन लाल गर्ग ।
भीतर जाती तन शिराओं संग
नही करता कोई प्रयास
स्वक्रिय कर्म तन का
ओर यह क्रिया
नही अधीन मेरे कि आरंभ अंत का
श्रेय मिले
ठीक यही गति मेरे व्यतीत क्षणों की
आये भी गये भी
नही वश रहा
जीवन यात्रा के समय पर
कहां से लाऊँ अतीत
विगत समय विलुप्त हुआ
लेकिन अमिट दर्द देता गया
अपनी स्मृतियों के स्नेहिल तार
छोड गया वर्तमान संग
कैसा यह स्थूल सूक्ष्म का बेबूझ खेल
अंश भर मति से विराट का ज्ञान
नही संभव
पर सत्य की यात्रा
केवल वर्तमान संग क्यों
अतीत अछूता भी निर्लिप्त भी
व्यतीत संग
क्या व्यतीत होता सत्य
जीवन की तरह
शायद नही जीवन सत्य
एक बेबूझ अज्ञात यात्रा
निर्धारित समय की
ओर निर्धारण की क्षमता भी
योग्य नही जीवन
ले सके हिसाब
सुख दुख पलट जाना
नही नियंत्रण स्वयं
जीवन तो मात्र
यथार्थ स्थूल अभिनय का भ्रम
शायद मायिक स्वप्निल
सम्यक यात्रा
अनाम अकाम की अभिनय शाला
यहां नही गहराई दिव्य की
अनंत सी
नही क्षणिक यात्रा नही बनी
कि न बचा जाये रति भर भी
कि डूबना हो सके सरिता बन
महा सागर अनंत तल तक ।
छगन लाल गर्ग ।