Tuesday, June 14, 2016

एक प्रश्न

बुरा तो नही मानोगे
सिर्फ एक प्रश्न हर बार
रह जाता निरूत्तर
अंदाज सत्य नही केवल कामचलाऊ आधार
कुछ अर्से खुद का खुद को बहलाना मात्र
जब से विमोहित होकर जुडा
हिन्दी कविता कम्युनिटी से
अच्छा लगा
साहित्य संगत अवसर पाने का सपना
होगा पूरा
ओर नवल अंकुर कपोल सी कोमल
सुमधुर राग से सजी कविताई
मिलेंगी पढने को
फक्त स्वयं से जूझते विवश अपने से
बेबूझ परसाई जीते मेरी तरह
ओर कविवर क्यो हैं मौन
आमंत्रित करो ना राग प्रहरी
कि नेह निर्झर शब्द बन कर बहे
मानव धरातल
ओर तमाम शुष्क तन की रेत भीगे
रस प्रवाह भीतरी स्त्रोत का उदगम
तुम ही करो ना
ओर व्यर्थ होगा अन्यत्र प्रयास
बुरा मत मानना केवल आत्मीय निवेदन मेरा
सुनते हो ना पुकारता हूँ कवि तुम्हें
करो नाम सार्थक अपना
छगन लाल गर्ग