Friday, June 17, 2016

विस्तार

बडा अदभुत हुआ विस्तार
हर कहीं
नही लगता सामान्य रहे अब तुम
भरपूर जोश भरा बेहोश जीवन
निरंतर भरता जा रहा उडाने यांत्रिक
शरीर के साथ उडान का वजन
अब महसूस करने लगे तुम अपना
नीजपन श्रेष्ठता का मापदंड
ओर बेपरवाही की उडान भरते घनी ऊँची
नही आते तुम नजर फिर
सामान्य की ससीम दृष्टि
मेरे नेतृत्व के सिरमौर चौकीदार
आसमान से कब लौटना होगा तुम्हारा
धरती वासियों की अस्मिता पर नित नये संकट
आते चुभते देते जख्म तुम्हारी व्यवस्था के
अब हो क्या
अधिकांश तुम विसरते गगन में
कभी कभार
उतरते भी हो आसमान से धरती पर
तो भ्रमित या आर्कषण मोह
कदम रखते विदेशीय धरातल
बदनसीब हम कि नही स्पर्श कर पाते
आपके शरण ओर होते रहते वंचित
आपके आशीष वचन से
ओर लाभ उठा लेते आपका विदेशी
अब कैसे कहूँ
वह जमीन भी नही हमारी ओर आप
चौकीदार बनने का दावा करते रहे आओ ना
स्वदेश तरस गये सर
अंतिम समय तक ताजपोशी के