सर्वश्रेष्ठ हो
तुम
मंजे हुए दिव्य प्रजातंत्र नभ मे
एक मात्र सूर्य
आलोकित तुम्ही से यह धरा
अंगीकार करता तुम्हारा हर कथन
भलाई इसी मे कि आत्मसात करूँ तुम्हें
बहुत जरूरी हो गया अब
कि साहित्य पढूँ श्लाघा का ओर पाऊँ
बेहतरीन स्तुति एकदम ताजी
शायद रीति काल मे
लगाना होगा ध्यान का अभ्यास
दरबारी कवियों की स्तुति
अपने आश्रयदाता को समर्पित हुई
ढूँढ कर करना होगा परिमार्जन
आज के लायक शब्दावली मे
गूँथना होगा मुझे
मीठास भरनी होगी शहद सी
तभी वर्चस्व के खेल का मोहरा ही सही
अपनी कही जगह टिकाऊ मिले
कुछ नसीब चमक हो
करता जाता हूँ साधना रात दिन
नव सृजन परिस्कृत बन उभरे
ओर छा जाये स्तुति जगत में फिर एक बार
बेमिसाल उजियारा ।
छगन लाल गर्ग ।
मंजे हुए दिव्य प्रजातंत्र नभ मे
एक मात्र सूर्य
आलोकित तुम्ही से यह धरा
अंगीकार करता तुम्हारा हर कथन
भलाई इसी मे कि आत्मसात करूँ तुम्हें
बहुत जरूरी हो गया अब
कि साहित्य पढूँ श्लाघा का ओर पाऊँ
बेहतरीन स्तुति एकदम ताजी
शायद रीति काल मे
लगाना होगा ध्यान का अभ्यास
दरबारी कवियों की स्तुति
अपने आश्रयदाता को समर्पित हुई
ढूँढ कर करना होगा परिमार्जन
आज के लायक शब्दावली मे
गूँथना होगा मुझे
मीठास भरनी होगी शहद सी
तभी वर्चस्व के खेल का मोहरा ही सही
अपनी कही जगह टिकाऊ मिले
कुछ नसीब चमक हो
करता जाता हूँ साधना रात दिन
नव सृजन परिस्कृत बन उभरे
ओर छा जाये स्तुति जगत में फिर एक बार
बेमिसाल उजियारा ।
छगन लाल गर्ग ।