Friday, June 17, 2016

सर्वश्रेष्ठ हो तुम

सर्वश्रेष्ठ हो तुम
मंजे हुए दिव्य प्रजातंत्र नभ मे
एक मात्र सूर्य
आलोकित तुम्ही से यह धरा
अंगीकार करता तुम्हारा हर कथन
भलाई इसी मे कि आत्मसात करूँ तुम्हें
बहुत जरूरी हो गया अब
कि साहित्य पढूँ श्लाघा का ओर पाऊँ
बेहतरीन स्तुति एकदम ताजी
शायद रीति काल मे
लगाना होगा ध्यान का अभ्यास
दरबारी कवियों की स्तुति
अपने आश्रयदाता को समर्पित हुई
ढूँढ कर करना होगा परिमार्जन
आज के लायक शब्दावली मे
गूँथना होगा मुझे
मीठास भरनी होगी शहद सी
तभी वर्चस्व के खेल का मोहरा ही सही
अपनी कही जगह टिकाऊ मिले
कुछ नसीब चमक हो
करता जाता हूँ साधना रात दिन
नव सृजन परिस्कृत बन उभरे
ओर छा जाये स्तुति जगत में फिर एक बार
बेमिसाल उजियारा
छगन लाल गर्ग