भीतर बाहर
टटोलता जाता
सामजस्य का हिसाब
असंतुलन का अंतराल
घना जोखिम
डरता रखता हूँ
हर कदम
जिन्दगी की राह
बेबूझ हुआ
जीता रहता हूँ अनमना सा
जब भी करता हूँ कोशिश
संतुलन की
उपेक्षित होता जाता
अपनो से भी
स्वयं से भी
फिर नही रह पाता लायक
आदमियत की माफिक
अनजानी दशहत
घिरती जाती जिन्दगी
कि नकारा साबित हुआ
कही उखाड न दिया जाऊ
खरपतवार की माफिक
मजबूरन जिन्दगी तुझे
जीने लगा हूँ
दोगले इन्सान की तरह
कि अब होने लगा अहसास
यही हूँ इसी दुनियां का।
छगन लाल गर्ग।
टटोलता जाता
सामजस्य का हिसाब
असंतुलन का अंतराल
घना जोखिम
डरता रखता हूँ
हर कदम
जिन्दगी की राह
बेबूझ हुआ
जीता रहता हूँ अनमना सा
जब भी करता हूँ कोशिश
संतुलन की
उपेक्षित होता जाता
अपनो से भी
स्वयं से भी
फिर नही रह पाता लायक
आदमियत की माफिक
अनजानी दशहत
घिरती जाती जिन्दगी
कि नकारा साबित हुआ
कही उखाड न दिया जाऊ
खरपतवार की माफिक
मजबूरन जिन्दगी तुझे
जीने लगा हूँ
दोगले इन्सान की तरह
कि अब होने लगा अहसास
यही हूँ इसी दुनियां का।
छगन लाल गर्ग।