लाऊँ कहां से
आप सा दीदार कि अटके रसास्वादन निमित्त
हर किसी की अभिप्सा
ओर पाये घना दिव्यानंद
असंभव यह स्थूल सौंदर्य का रस
उपरी अभाव भीतर की रसधार को बचा लेता
नही लगा सकता अनुमान
कठोर शिलाओं के मध्य बहती विश्रांति की नद
नही कर पाती उदघोष अपनी रस पूर्णता का
नही आवश्यक भी समझती
उसकी मग्न गति परम सत्य के कोष संग
करना चाहती विलय
ओर बाहरी कठोर स्थूल अरूप मेरा
साधना पथ का चौकीदार बना
करता रहता पहरेदारी परम सत्य के संग
अंतिम समागम की दशा तक
मेरे साक्ष्य बने बाह्य सौंदर्य क्षमा करना मुझे
नही चाहता सामर्थ्य कि लाना पडें रसास्वादन निमित्त
बाहरी सौंदर्य ।
छगन लाल गर्ग ।
आप सा दीदार कि अटके रसास्वादन निमित्त
हर किसी की अभिप्सा
ओर पाये घना दिव्यानंद
असंभव यह स्थूल सौंदर्य का रस
उपरी अभाव भीतर की रसधार को बचा लेता
नही लगा सकता अनुमान
कठोर शिलाओं के मध्य बहती विश्रांति की नद
नही कर पाती उदघोष अपनी रस पूर्णता का
नही आवश्यक भी समझती
उसकी मग्न गति परम सत्य के कोष संग
करना चाहती विलय
ओर बाहरी कठोर स्थूल अरूप मेरा
साधना पथ का चौकीदार बना
करता रहता पहरेदारी परम सत्य के संग
अंतिम समागम की दशा तक
मेरे साक्ष्य बने बाह्य सौंदर्य क्षमा करना मुझे
नही चाहता सामर्थ्य कि लाना पडें रसास्वादन निमित्त
बाहरी सौंदर्य ।
छगन लाल गर्ग ।