बहुत लज्जित
अचंभित
अति दानव भावों के विनाश
निमित्त
हम बन जायें अस्थिर
ओर कूटनीति त्याग कर
लेने लगे सहारा
अशोभनीय शब्दावली का
जब परिपक्वता पाने पर भी
होता इस प्रकार
बहुत भीतरी पीडा घेरने लगती
क्या होगा
कोन संभालेगा भार
युवा पीढी मे नव संस्कार
ओर भारतीय संस्कृति के
परिमार्जित विचारों के हस्तांतरण भीतर
जब विद्वान बुजुर्गो में
शिष्टाचार नही रहता
हिन्दूवादी विचार मे
भारतीय संस्कृति का अडिग
किन्तु गरिमा देता सच
शास्वत सुरभि व सौंदर्य भरा
सचेत रहना होगा
यह हमारे आपाधापी में
गंदला ना करे कोई ।
छगन लाल गर्ग ।
अचंभित
अति दानव भावों के विनाश
निमित्त
हम बन जायें अस्थिर
ओर कूटनीति त्याग कर
लेने लगे सहारा
अशोभनीय शब्दावली का
जब परिपक्वता पाने पर भी
होता इस प्रकार
बहुत भीतरी पीडा घेरने लगती
क्या होगा
कोन संभालेगा भार
युवा पीढी मे नव संस्कार
ओर भारतीय संस्कृति के
परिमार्जित विचारों के हस्तांतरण भीतर
जब विद्वान बुजुर्गो में
शिष्टाचार नही रहता
हिन्दूवादी विचार मे
भारतीय संस्कृति का अडिग
किन्तु गरिमा देता सच
शास्वत सुरभि व सौंदर्य भरा
सचेत रहना होगा
यह हमारे आपाधापी में
गंदला ना करे कोई ।
छगन लाल गर्ग ।