Wednesday, June 15, 2016

ढूँढता रहा

ढूँढता रहा
हर दरिद्र के वेदना के राग मे
अति महीन स्वर की कंपन बीच
तेरा रश्मिमय तरंगित रूप
किसे दिखता आकार बन
अदृश्य चेतन संचार प्राण देता
भर उठता वासना का अतृप्त राग
तेरा स्मरण विलोपित हो जाता
मंदिर की घंटियों में
बन उभरता ध्वनिमय अदृश्य अहसास
मेरे आसपास रमण होता फिर तेरा
असंख्य भेदमय श्रृंगार विस्मृति होता
कण कण तत्व मय भाव मय रूप मय
बहुत बाद बेहिसाब मिट मिट जब जाता
तब कही इस विरल जाल मे किरण पाता
मेरे परम सृष्टि कर्ता अजीब खेल खिलाते
ओर उसी खेल मैं हंसता रोता तुझे पहचान पाता
इस कठिन खेल का अनाडी खिलाडी
प्रभु बार बार जन्म भंवर मे फसा तुझे ढूँढता रहा ।
छगन लाल गर्ग ।