छटपटाहट हीनता
नहीं देती चैन
हर प्रयास मिलता
अंतोत्गत्वा निराशा की खाई
रोती रहती भीतर ही भीतर
प्रतिभा की धार
खाते जाते
हर प्रयास पत्थरों की चोंट
हो चुका लहु लुहान
रेंगना नहीं आता
कदमों तले
दैत्य मानसिकता लिए
समर्थों के कदमों तले
संवेदना के बीज
स्वार्थ की औषध बने
देती जाती प्राण वायु
समर्थ शोषकों को
और प्रतिभा
मरणासन्न हुई
लेती हैं अंतीम श्वांस
सभ्य युग मे
नामान्तरण हुआ जाता
प्रतिभा का
अब एकाधिकार पाया
सर्वश्रेष्ठ बन चुकी
दैत्य परंपरा की श्लाघा
यही बन चुकी प्रतिभा।
छगन लाल गर्ग।
नहीं देती चैन
हर प्रयास मिलता
अंतोत्गत्वा निराशा की खाई
रोती रहती भीतर ही भीतर
प्रतिभा की धार
खाते जाते
हर प्रयास पत्थरों की चोंट
हो चुका लहु लुहान
रेंगना नहीं आता
कदमों तले
दैत्य मानसिकता लिए
समर्थों के कदमों तले
संवेदना के बीज
स्वार्थ की औषध बने
देती जाती प्राण वायु
समर्थ शोषकों को
और प्रतिभा
मरणासन्न हुई
लेती हैं अंतीम श्वांस
सभ्य युग मे
नामान्तरण हुआ जाता
प्रतिभा का
अब एकाधिकार पाया
सर्वश्रेष्ठ बन चुकी
दैत्य परंपरा की श्लाघा
यही बन चुकी प्रतिभा।
छगन लाल गर्ग।