Friday, June 17, 2016

अभिप्शा तुम्हारी

कहां पाओगे मन का
अभिप्शा तुम्हारी
अतृप्त वासनाओं की अति
निरंतर हैसियत भूलते जाते
केवल ख्वाहिश की वजह
सच झूठ नही रखते मायने
तुम्हारी धारणा की जिद्द
ढूँढते वही जिसके काबिल होने मे
तपना होता अंगारों की तीक्ष्ण तपिश
ओर तुम बिना कुछ किए
बेबूझ अहंकारी की तरह रटते जाते
केवल भ्रम की दुनिया
ओर वह चाहते जिसका मर्म अज्ञेय
तुम्हारी तमाम शिक्षा दीक्षा
नही आती काम
तर्क जाल अकारण अनुपयोगी रह जाता
नही यह सत्य का उजास
मिथ्या धारणा तुम्हारी कि शिक्षा कोष
बढाता सत्य
बडे अंधे राह के पथिक बनकर
ढूँढने जाते सत्यनारायण
कैसे होगा यह
सुंदर शात्विक शब्द नही आते काम यहां
पहले मांजना होता खुद को
मेल सदियों का जमा भीतर
परत दर परत मोटी खाल बन चुका
ओर यह
उलझन देती शैक्षणिक योग्यता से नही
प्रखर अन्वेषी सतगुरु की प्रगाढ दृष्टि मात्र
तुम्हारी अज्ञान की अहंकारी खाल
जलाने मे सक्षम मात्र
कहां ढूंढने लग गये बिना ज्ञान चक्षु
सत्वगुण धारित पात्र व्यक्ति
पहचान का सूत्र पाये बिना
अहंकार कैसे कर सकेगा निर्णय
बुरा मत मानो
स्वयं की पात्रता बिना का सत्य
सत्य नही व्यभिचार है मानव के साथ
तुम्हारे अहंकार का
समझोगे कभी यदि मानव बन सको
छगन लाल गर्ग