Sunday, January 31, 2016

मिटते बिम्ब।

 हो क्या
अस्तित्व नहीं कहता
झलक सी बनती
कभी पहचान दिलवाती
कभी अनजान बनती
विभ्रान्ति मे स्वयं का अहसास
करता जाता भुलता जाता
क्या समझू जीवन
तुम हो क्या
उन्माद पल अनायास
लगने लगते चिर अपने
रस का सरोवर
उमड घुमड कर
तंरगित जीवन  मे
आनंद देता
 तेरी मोहक मदभरी
मृदुल पहचान
तुम हो क्या
कभी क्लान्त शून्य बने तुम
वेदना नद वेग बहते
हारते रहते हर पल
जीवन का हर पल अमोल
नहीं समझ आता मुझे
जीवन तेरा असली मर्म
तुम हो क्या
घिरना होता अज्ञात
मोहक जाल देते संकेत
मीठे स्वप्न बाँसूरी बन
ध्वनि देते अबाध अविराम
आह सौन्दर्य के अछूये बिम्ब
सलज्ज मुस्कान लिए अनुराग स
मदभरी मुग्धा के मदभरे बोल
डूबती चेतना लेते घोल
घूघराले अलको का बिखराव
विधु मुख का ले आधार
खेलते पवन के झौको संग
आह यह दृश्य जीवन का मोल
सत्य यह भी नही
जीवन का खेल
आखिर तुम हो क्या
अनुभूति जो मैं करता जाता
हर पल तुम मिटाते जाते
नित नयापन अबोध जीवन
नहीं कर पाता परिचय पल का
मिटता हर पल देता जाता
मूक मौन बन संकेत गहरा
नहीं सार केवल हैं आभास जीवन
मिटता केवल बिम्ब जीवन ।
छगन लाल गर्ग।


कुंठित हैं धुऑ।

  सचेतन दागित पदार्थ
 देता संघर्ष मय अंधेरा
ज्वलित पदार्थ नहीं पीघल पाता
कि ले सके आकार
निष्क्रिय राख का
धधकती चिंगारी चाहती विनाश
प्रज्वलन होता ले आकार
अनिष्ट अतिचारो की राख
यही सत्य भूमा का
स्वीकृति लिए
जीती रही मानव संस्कृति
परंतु युग सत्य
चाहता बदलाव
 मूल्यों ओर आस्थाओ मे
नवीन मूल्य
अधिक कसे जा चुके
तर्क मयी कसौटी पर
नहीं रहा संचय
झूठला दी गई मान्यताऐ
नहीं चलेगी
तोडना होगा अंधा मोह
परंपरा का
पहचानी सी असली मानवता
विशुद्ध हृदय लिए
मौन मूक देती
मानव होने की असलियत
गिरे पर्दे अचेतना के
मत उठाओ
अन्यथा अर्से से
ज्वलित कामनाओ का धुऑ
कुंठित हैं घना
नहीं ले सकोगे फिर
जिन्दगी की श्वासे
कडवाहट बन चुकी विष तुल्य
समझो अंतिम सत्य
हैं स्पष्ट समझने लायक
कुंठित हैं धुऑ।
छगन लाल गर्ग।

अभिव्यक्ति का खतरा।

मंजन करना होता
अभिव्यक्ति देने से पहले
हर कथन
कहना होता परिमार्जित
किसी भी शैली के रहते
हर शात्विक अनुभूति
नहीं बन सकती अभिव्यक्ति
होना होता विवश
भीतर ही भीतर संश्लेषण करने
शब्दों ओर भावों की
सामजस्यता बीच
खो जाते मूल प्राण अभिव्यक्ति के
ओर कथन बन जाता
चमक देता खोखला सा
नहीं भीतर सार रखता महत्व
शब्द चित्र हो उठते
आकार लेते
छीपी भीतरी वासनाओ की
बोलती तस्वीर
अच्छा लगता मन माफिक
परोसा शब्द जाल
अनंत कहां हैं
अब हृदय भीतर
कि टटोल सके शास्वत सत्य
अभिव्यक्ति मे
बहुत हुआ सृजन
अब रहने दो यह सब
होने दो
द्विअर्थी चमत्कार
रस भी रसाकार भी
हो जाने दो संपूर्ण
कि प्यास पीती रहे
अंत तक
अतृप्ति की आग को
भ्रमित रसागार बन
ओर अभिव्यक्ति बदले
मेरी तृप्ति के राग बनकर
कि जीऊ निरंतर
शरीर सा मन बनकर
हैं यदि खतरा
अभिव्यक्ति का
मंजन करते रहो भावो को
शब्द देकर
आखिर रसास्वादन निमित्त
जिन्दगी बने
ओर यह दायित्व निभाना
भी सृजन का आयाम हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, January 30, 2016

लिखने दो।

लिखने दो
चार पंक्तियाँ
तुम्हारे लिए
बिखरावो का वायु
भटकाव देता
समेटने दो थोड़ा
भर लू आहिस्ता से
भीतर
कि स्मृतियों संग
कुछ अंगडाई सुख का
पा जाये अहसास
कहने दो कुछ बोल
अपनत्व भरे
स्मृति बसे जो कहना चाहे
आरजू मत कहो
उन्माद घना
संग पाया अरमान
नेह की लहरों का
उठती हैं उतंग
उठ जाने दो
मिल लेंगी अनंत तक
प्रत्यक्ष न सही
अप्रत्यक्ष ही
न मिले आमने सामने
इतना तो जाने दो
नेही के स्वर
पहुँच पाये कर्ण ताल तक
कह देंगे
सुन लेंगे
भीतर भीतर
संकेत भरे मुस्काते
प्रेमिल राग
कहता इतना सा
शायद ममत्व भरा
शास्वत चेतनमय
तुम बसते हो प्राण
भीतर मे
नहीं जाते
रहते चेतन मे भी
अचेतन बने
हर गतिविधियों मे
रचे बसे
नहीं यादों की
असुविधा
नित स्पंदन पाता
जीता हूँ तुम्हें
नहीं कहता
अदेही हुए भी
देह भूला
महसूस करता
जीवन हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।

हिस्से ।

आस्था का प्रश्न
भीतर तक रखता
संवेदना बहाव
शनिचर देवता के मंदिर
बढाता हूँ कदम
शनिवार हैं आज
अच्छा रहेगा
तेल सिन्दूर चढा सकूँ
चौराहे पर
हाथ फैलाये भिखारी
अनदेखा कर बढता हूँ आगे
चाय की तलब लिए
मंदिर के ठीक सामने
हाथ जोडे खड़ा
भगवे वस्त्र मे बूढ़े की लाचारी
चाय के लिए
अनायास जेब से
संचित रुपये
देता हूँ साधु को
बढता हूँ मंदिर की सीढ़ियाँ
खाली सा
बिना तेल सिन्दुर
हनुमानजी मंदिर के हिस्से
अलग किए
दस का नोट
रख देता हूँ भंडार पेटी मे
पछताता आता हूँ
हनुमान मंदिर
करता हूँ विनती
प्रभु भूल माफ करना
आपस की बात ठहरी
आधा हिस्सा
बिना लडे झगड़े
शनिचर देवता से
आप अवश्य ले  लेना
मुझे माफ कर देना।
छगन लाल गर्ग।

Friday, January 29, 2016

शिक्षक का छाया।

  अब मत कह देना
 शिक्षक होते भी
गरिमा नहीं जानता अपनी
जानता हूँ बेहतर
नहीं चूकता कोई अवसर
जहाँ देखे मेरे
कोई कर सके जुर्रत घर मे
मर्यादा भंग
या अनुशासन हीन आचरण के
ले सके कदम
रिटायर होते ही
परेशान हैं बैचारे
नहीं चाहता कोई फालतू
रूके घर
सब निकल पड़ते
किसी न किसी काम पर
हमारा बेरोजगार लवली पुत्र भी
अब कहां रहता घर
मेरे घर आते ही
लगा काम पर
अब क्या करे
अकेले  हैं
पत्नी से नहीं बनती
सुना हैं
जब से
कि मैं प्राइवेट काम पर
जाऊँगा
सभी खुश हुए मेरी
सेवा बढा दी हैं
अब समझना रखता हूँ
बाकी
कारण नहीं कहूँगा
शिक्षक की गरिमा
आडे आती हैं ।
छगन लाल गर्ग।


कहना तुम ।

  नहीं समझ पाया
माया तुम्हारी
अछूये जीये तुम
मुझे
मन माना जीवन रहा तुम्हारा
चाहा किया
यही कहूँगा हर बार
नहीं दी त्वज्जौ जिन्दगी को
कहते सुनता
बड़ी कीमती जिन्दगी
अनेकानेक पुण्यो का घनाव
देता जिन्दगी
पर तुमने सुना कहां किसी का
कभी
वहीं करते रहे
जिनसे डरती हैं जिन्दगिया
छल हुआ मेरे साथ
चले गये तुम
मंझधार बीच छोड़ कर
चलो ठीक
जीवन मृत्यु
अदृश्य जाने
पर तुम भी तो हुए अदृश्य
सर्वोच्च शक्ति समीप
कहना तुम
बारी का इन्तजारी
बाप
चाहता आना पास तुम्हारे
बेटे के बाद
कहोगे ना
अबकी बार
छल मत करना पुत्र ।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, January 28, 2016

पुख्तापन।

 हर कोई लगा
 इसी उद्योग
आ सके जीवन मे
पुख्तापन
कि लगने लगू भरा भरा
कुछ तना कुछ उभरा हुआ
ओरो से
गुजरता हर लम्हा
नहीं दे पाया संतुष्टि
आज तक
कि कुछ पाया बेहतर
ओरो से
दम मारता
 हाफने लगा हूँ
पुख्तापन पाने तुझे
अहसास हुआ आया तू
मेरे भीतर साहस बना
हाँ ठीक इसी तरह
अब लगता
मजबूत हुआ घूसते
नहीं डरता
मौत देते रास्ते भी
बिना डरे
निकलता
बचता बनाता अपना मुकाम
सपाट जीना
संवेदना हीन जीवन
पुख्त बना देता
सभी रास्ते
रोशनी नही तो क्या
इन्तजाम करते
 जाते अंधेरे अपनी
मतलबी दुनिया का सच
जहाँ रोशनी नहीं
विशाल पुख्तापन छाया बना
घेरता हो जीवन का
अंधकार ओर रोशनी कतरे
बुझाने का हो पुख्ता
इन्तजाम
हर कहीं आज का यह पुख्तापन
घेर चुका आम जिन्दगी
श्वासो का आना जाना
बख्शीस हैं उनकी
शाम ढले तक मोहलत
गुजरते पल
पाते जाते हकीकत
कि यह नासमझी
पुख्तापन की नहीं
हमारी हैं
कि खुली ऑखो देते
न्योता
खुद की हत्या का
कि मरती रहे संवेदना
जीवन भर
यंत्रवत बने भोगते रहे
पुख्तापन।
छगन लाल गर्ग।





गुमनाम ही सही ।

 तनिक खुशहाली का छाया
पाने की ललक लिए
बढ़ता जाता
गुमसुम सा सोचता जाता
अपना हित
नहीं पता कितना सच
अधूरा अधूरा महसूस करता
स्वयं को
क्या सच क्या झूठ
नहीं पाता अपने भीतर सत्य
कि जीया भी
ठीक ठाक या
कुछ अन्यो का परोसा
जीवन
नहीं याद आता कि
किया हो कभी मन चाहा
एक जिम्मा संभाला
जीता रहा
कि न कहे कोई मुझे
नकारा
वहीं करता जिसे
करना होता अनिवार्य
पारिवारिक निर्देशो के तहत
तभी अब पाता हूँ
जगह परिवार मे होने की
अपनी
साबित होती हैं सदस्यता
हूँ कहां मैं अपना
नहीं कहता कि जीता हूँ खुद
पता नहीं
कितनो की सवारी उठाये
चलती जाती
मेरी जिन्दगी सामर्थ्य लिए
शायद अंतिम बल तक
चलना होगा
इसी तरह संस्कृति की चाल
की रहे अस्मिता
खुद से हुआ गुमसुम
जीना तो हैं ही
गुमनाम ही सही ।
छगन लाल गर्ग।


रूग्ण उर्मी ।

उफान आवेग
बेबूझ हुआ
 ऊर्जा लिए मिलना चाहता
स्वयं की मोह भरी लालसा
आपूर्ति निमित्त
यह ताप भरी
आनंद की ऊर्मी
लोभ ओर मोह घीरी
कहता इसे
प्रेम की सघनता
देता जाता शात्विक स्नेह का
पावन स्फूरण
उतारू हूँ
तन की तृप्ति निमित्त
सभी उपाय
करने को संकल्पित
आज का युवा
नही मिलती
भावनाओं की भीड़
जहाँ कहती हो
कि प्रेम होता दान
अहंकार की
तृप्ति नहीं
एक तडप प्राणों की
जिसमें अंश छिपा
परमात्मा का
अनंत प्रेम की यह व्याख्या
कब लेगी मूर्त आकार
कि फिर कहें
नहीं हैं प्रेम
रूग्ण ऊर्मी ।
छगन लाल गर्ग।



Wednesday, January 27, 2016

तस्वीर ।

तुम हो या कि तस्वीर
एक ही आभास होता
आत्मा मे
दोनों चमकते हो
ऑखो मे प्यार लिए
देखना चाहता तुम्हें जी भर
हर रूप परिवर्तन
होता जाता
ऑखो की रोशनी के साथ
ऑसूओ लेने दो मुझे
दम थोड़ा थमो तो तुम
देखता हूँ निखरापन
मेरे महबूब का
बाहर बाहर
जब बुलाता उन्हें भीतर
नहीं रहता रूप बिम्ब
हो जाता समर्पित हुआ
एकाकार
नहीं रह पाता स्वयं
घूल मिल हो जाते विलिन
मात्र महारस
अनुभूति रहती
रोको तो नीर नयन
देख लू मोहक तस्वीर ।
छगन लाल गर्ग।

Tuesday, January 26, 2016

प्यासा ख्याल।

तोड देता मुझे
ख्यालो का दरिया
जोडता नहीं
अति कर जाता
ओर मैं
टूटता जाता खंड खंड होता
ख्याल तेरा
लडाता मुझसे
शायद प्यासा रहा
होते तेरे
नहीं बन पाया सेतु
दीवार बना
हम दोनों बीच
वासना की
तेरी मेरी छाया तले
हर ख्याल
बनता रहा विचारों का तनाव
कैसे कहूँ
प्रेम का दरिया
कदमों की ऊर्जा
प्राणों की प्यास
प्यार भरी
तरसता रहा मोह
नहीं सामर्थ्य इसका
पा सके प्रेम निर्मलता
अन्यथा
ख्याल तेरे
शक्ति बने पहुँच जाते
प्राणों तक
ओर विरह सघन बन
छा जाता मिलन बन
नहीं रहती मुझे
शब्दों की जरूरत
कि करू इजहार
स्मृति पल
रमते तुम चेतना मे
ओर मुग्ध हुआ
भूलता जाता
अस्तित्व मेरा
नहीं जीया प्रेम
मोह भ्रमित विसरता रहा
मोह भंवर बीच
वितृष्णा घीरा
लडता हूँ ख्यालो से।
छगन लाल गर्ग।

Monday, January 25, 2016

मोह जाल पाश।

जग मोह अंगीकृत हुआ
कारण लिए जीता जिन्दगी
सापेक्ष घनत्व घीरा मोह
तन की चाहत तले
सहयोगी बन चुका मन
नहीं निरपेक्ष नेह
जहां विकसित होता
भीतरी कमल अकारण
पर आधारित
चाहत लिए वासना निमित्त
नहीं नित्य
अलौकिकता लिए
सर्व भूतो के कल्याण निमित्त
मेरा स्नेह स्वार्थ साधक
कहता जाता शात्विक
असली मोह भरा
मात्र स्नेह का अदृश्य कतरा
अंश बन जाता मोह बीच
परिमल निखार पाता
मोह जाल पाश
खिलने लगते अचेतन मे कुसुम
मद देती लौकिक गंध
बन जाती दिव्य सुरभि
पर यह क्षण आता तभी
जब छूटता मोह
प्रेम बन जाता मुक्ति
सर्वस्व सार घूल घूल जाता
जब जाता मोह जाल पाश।
छगन लाल गर्ग।

कहो ना मन।

  कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
उठते उन्माद पल का भाव
निहारते अपलक नयनो का अनुराग
भटकते भावों का विराम
स्पंदित धड़कनो का राग
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
सलज्ज मुस्कान सिहरन तरंग
चीर देती हृदय व्याकुल प्राण
अदृश्य कामनाऐ बहती अविराम
चेतना को देती विराम
हर लावण्य रश्मि समाती अविरल
हृदय जगत मचती भूचाल
नयन थकते रूप मदिरा
रश्मि संग पान करते
नहीं मन तू वस होता मेरे
अस्तित्व संग ले विलय पाता
सौन्दर्य तनी चेतना के
छाये मे विश्राम पाता
नहीं समझ पाऊ रे मन अब
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
ललक लालिमा लावण्य मद
इतराता सौन्दर्य देह बना
अंतराल हृदय देह बीच विकट
नहीं साम्य झलक मिलती कहीं
रूक ना निहार तो समता का
मापक तुला कहीं दिखती नहीं
अचकचा तो थोड़ा रूक जरा
नश्वरता भी आक जरा
भीतर भाव विमल रस चख
चेतन तत्व अंकुर उठे
प्रथम सीढ़ी मत आहत बन
अलौकिक सौन्दर्य सृजक निहार
परम सौन्दर्य कोष वहीं
हृदय मे रस स्त्रोत यही
उस स्त्रोत को व्यर्थ बर्बाद न कर
सार यही से बहता रे मन
अब तो
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार।
छगन लाल गर्ग।

हमारा गणतंत्र ।

अस्मिता देता माटी की
हमारा गणतंत्र
निराला विश्व से सर्वोत्तम
मानव मन का सच्चा साक्षी
आँकाक्षाओ का रखवाला
सर्वहितो का साधक
हमारा गणतंत्र
विश्व मानवता का रखवाला
निक्षपक्षता का हिमायती
जनमन का भाता
समाजवादी व्यवस्था से रौनक
कानून से समतापरक
ऊच नीच निवारक
सबके हित का साथी
हमारा गणतंत्र
शहीदों की कुर्बानी
निर्मित रही पृष्ठभूमि
आजादी की अकथ कहानी
लेती हैं इसमें श्वासे
हर श्वास बनी प्रेरणा
तन मन अर्पित मातृभूमि पर
झुकने न देंगे माँ तेरा
सिर रहे नित गगनचुम्बी
हम संतान तेरी कम नहीं
दुनिया मे कीर्ति गंध फैलाये
महका देंगे तेरा अंचल
हर शानोशौकत से
आओ वीरो सपुतो
गणतंत्र आज मनाये।
छगन लाल गर्ग।



Sunday, January 24, 2016

आत्मावलोकन।

बाहरी जीवन जीया अतिशय
नहीं मिलता फुर्सत का समय
आवश्यकता होती पाता संचय
कि आत्मसात करू बाह्य स्वयं ।
अनुभूत पल कब अपने रहे
समय संग अपरिपक्व रहे
परिपक्वता मे दमन हो बहे
जीवन मे वितृष्णा शाप रहे।
निष्ठूर स्वप्न नहीं  देते रस
स्वार्थमय अपनत्व  निरस
झाके अभिसार लगे सरस
अंत परिणाम दर्द हूँ विवस।
चमत्कार नहीं जीवन
कर्ममय अभिनय लीन
रीतने मे गागर तल्लीन
चेतना ही रश्मि किरन।
बीतता हर पल लाता अवबोध
किनारा विषम त्याग तू अबोध
लहरे अनंत उठी दे संकेत बोध
प्राण तत्व नहीं भौतिक अबोध ।
ज्वलन पाते जीवन गुजरा
हर पल चिन्ताओ का घेरा
राग द्वेष संग्रह दौडा फिरा
मोह मृगतृष्णा मे तेरा डेरा ।
नहीं नहीं निस्सार नाहक
पाया अनपाया हैं भ्रामक
नहीं तेरा कभी रहे नाहक
जाल लिपटा त्याग दायक।
चल कुछ मन का मान कर ले
भाव भीतर सार मंथन कर ले
निर्लिप्त रहना समझ सार ले ले
कर्म जीवन शास्वत पहचान ले।।
छगन लाल गर्ग।




चुभते क्षण।

बढ़ती जाती चुभन
काटते हैं मच्छर
उखडी हुई सडको पर
पानी का बहाव
रूकता रहता
गंदगी घूला पानी
जगह जगह बनता जाता ताल
कि चलना ओर गिरना
दोनों रहते साथ साथ
संभाले कदम
अनायास अनुभव हीनता से
गचका खाते
ओर मटमेले पानी से
हो जाता सारोबार
नहीं रूकता ऑफिस का काम
ओर बदलते कपडो का सपना लिए
निकलता उसी रंग प्रकृति बख्शा
लिए गंदगी प्रवेश करता
ऑफिस
सुखाता रहता गंदगी तन के साथ
यह नजारा बरसात का नहीं
आम दिनों का
गंदी नालियो का स्थानांतरण हुआ
सडको मे
ओर आती रात
बढ़ाती चिन्ता मच्छरो की
काटते जाते चूसते रक्त
सुना इस बार
व्यवस्था करवट लेंगी
निर्णायक सरकार का राज
करिश्मा करेगा
आंदोलन की तरह बहुआयामी
कानून लाये जाएंगे
ओर अच्छे दिन आ जाएंगे ।
छगन लाल गर्ग।

विकृति।

अहं जीता जीवन
व्यक्ति नहीं रहता
ऊपर उठा तना
 बन जाता सूखा ठूंठ
संवेदना हीन पत्थर बना
वही भाते अपने ही तन
अस्तित्व लेते कीडे
जो नित्य करते जाते
खोखला सार हीन
गुदगुदाते तन उसके
स्पंदन की सार्थकता
समझ लेता जीवन की पूंजी
स्वयं चेतना शून्य
अकड ले डूबती
सूक्ष्म बनी जीवन की गति
ओर यूं ही सरल जीवन
जटिल पृष्ठभूमि घीरा
हो जाता विकृत
अहं की मरूभूमि
जीवन रस सोखती
मत होने दो
जीवन का पतन
स्वाभाविक सरल व्यक्तित्व
असल नमनीय
बहता जीवन सरितामय
स्पर्श पाये
निखर उठते मुरझाये कुसुम
छोडों अहंकार
विकृति मानव यहीं।
छगन लाल गर्ग।




Saturday, January 23, 2016

विराने का कोलाहल।

असत्य नहीं विराना
रूप बदलता सूझ लेता
नव प्रेरणा जीने की
समय व्याप्त सत्य तले
अब नहीं रहा विराना
सवेरे भ्रमण दौरान
जहां पसरे थे कूडें के ढेर
ले चुके शक्ल अब
टाट निर्मित झौपडियों के
अब नहीं रहा
सडक का किनारा खाली
जहां नीम का सूखा तना
थके कदमों को देता था सहारा
बैठता था उस पर
पा लेता ऊर्जा
कदमों की
अब उसी पर अधनंगे बच्चे
खेलते लुका चुप्पी
रूकना बेअर्थ समझ
बढता हूँ आगे
ठौर ढूँढता विश्राम
पर बच्चों की आवाज दबाती
सुनता हूँ कर्कश हमलेवर आवाज
रूकता देखता पीछे
पीटती जाती औरत
अपने ही मर्द से
समझ नहीं पाता रिस्तों का
यह रूप
मार खाती पत्नी करती जाती हमला
दुर्बल शरीर ओर ताकतवर गालियों से
नहीं फर्क महसूसता
संस्कृति ओर संस्कार बीच
सभ्य संस्कृति मौन पर दारूण
करती आक्रमण
ओर संस्कार बिना लाग लपट
विभत्स होते साकार।
छगन लाल गर्ग।

करे क्या।

सन्नाटा छायी जिंदगी
नहीं रह सकती निष्क्रिय
तलाश करती रोशनी के कतरे
अनंत बिखरे
समेटे भरती झोली
लगातार अनजाने अविश्वास भरे
नही देता साक्ष्य कोई
कि होगे काम लायक
भरता भी तरासता भी
बेबूझ बना
अब नहीं आवश्यक
क्षमता का विकास हो कैसे
चाहे बिना
रहना चाहता निर्लिप्त
उच्च क्षमता सामान्य हो जाती
पास आते ही सामान्य के
मात्र काम मेरा
शब्दों ओर अर्थों से
उत्पन्न  विकार
क्षण बोध तले रखता
गूंथना चाहता सत्य की माला
नीज जन्मी क्षण व्यथा को
देता जाता बिंब
अब सौंदर्य प्रेमी नही पाते
रसानन्द तो
करें क्या ।
छगन लाल गर्ग।





विवशता।

दोहरापन अनिवार्य
अगर श्वास चाहू लेना
यही सत्य अपना
बदलता रहूं  स्वरूप
कला जीवन
नित्य बदलते भाव सम
चलता रहे हर कदम
नहीं आ सके बाधा
सत्य लिपटी संवेदना की
पराजित करती जिंदगी
हाँ कला अभिनय चाहता
बनावट की सच्चाई
न छूटे
तरक्की करता सार्थक सूत्र
यहीं सार देता
यथार्थ जीना
संवेदनशील जीवन
नहीं भरता सुख देह तृप्ति
मन मत मांगों
विवशता।
छगन लाल गर्ग।

Friday, January 22, 2016

आकांक्षा।

नहीं जिंदगी आसान
उलझन देती
हर आकांक्षाओं निमित्त
चाहत का दरिया
लेता जाता हर पल
विशाल आकार
ओर संयोजन पल
भरता जाता हलचल
आकांक्षाओं की भीड
हो जाता बैचैन बिना पाये
मन वांछित
अति गहरे हर आकांक्षा
देती जाती गहन पीडा
सुख की चाह
रखती हल्के पर्दे छिपाये
दर्द भरे जीवन का गात
नहीं आता गणित
ले सकू हिसाब
जीवन चाहे सुखों का
बडी उलझन जीता  हूँ
जिन्दगी तुझे
सुलझाने तूझे
ओर अधिक घीरता जाता
अनजान अंधेरों की खाई
नहीं आकांक्षाओं का जाल
शास्वत
पर भौतिक तृष्णा का मोह
मेरा झुकाव
बढाता जाता उलझाव
ओर नैसर्गिक सत्य
होता जाता दूर
अति दूर
मृग तृष्णा के छाये घेरते
नित जीये जाता
आकांक्षा भरी जिंदगी
नहीं ठौर कहीं
पा सकू मानव होने का
अर्थ।
छगन लाल गर्ग।

अतिक्रमण।

अकेला नहीं
जहां खडा हूँ
अस्तित्व लिपटा
अंधकार
चलने नहीं देता
प्रकाश की ओर
घेरे हैं मुझे
जीवन व्याप्त घाटी का
गहन अंधेरा
दो  हैं हम
विपरीत प्रवृति लिए
नहीं चाहता संघर्ष
विजेता बनू
सामर्थ्य की सीमा
अवबोध पाता
लडना होगी मूर्खता
अंधकार से
ठहराव होगा
अंधेरे से जीवन का
नहीं
करना होगा अतिक्रमण
नहीं रह सकता
घाटी लडते अंधकार से
जीवन भर
शिखर की रोशनी
देती आमंत्रण
रूकना
लडना अंधकार
जीवन खोना हैं
करना होगाअतिक्रमण
अंधेरे का
बढना होगा शिखर की ओर।
छगन लाल गर्ग।


Sunday, January 17, 2016

हिसाब।

हिसाब से जीता हूँ
जिन्दगी तुझे
नहीं देता पहचान
भीतर भरी
बहुत संभलता हूँ
हर कदम रखते
बिल्कुल गणित लिए
सब देखता जाता
विवेक के बल
नहीं भीगने देता
कोई कोना तन का
कि लिपटे गंदगी
और संवेदना
शब्द ही निकाल फैंका
कौशो दूर
अब आराम है
साफ सुथरापन महसूसता
जीने लगा हूँ
नहीं पसंद
किसी गंदले रेंगते आदमी को
देखना
हटा देता हूँ न आये सामने
अब मिली पहचान
अर्थ समझते ही
वर्ग का हिसाब
भरापन आया हिसाब से
जाते ही संवेदना
आखिर सलिका आ गया
सभ्य जीवन का।
छगन लाल गर्ग।


Saturday, January 16, 2016

शब्द सत्य।

अभिव्यक्ति सत्य
शब्द देते नहीं थके
अबाध चल रहा
सिलसिला उद्धरण लिए
कौशल का खजाना
इस युग नित्य बहता
साबित करते सत्य
प्रमाण दिये
शब्द के साथ मेल खाते
चित्रों से
कि पुख्ता रहे मेरा कहा
पर हर शब्द
खोता जाता अपनी अहमियत
हमारे कारण
नहीं रहा विश्वास
शब्द ओर हमारे बीच
दोगलेपन का आवरण लिए
देते जाते अभिव्यक्ति
शब्दों को अपनी गरज
तभी शब्द खोते जाते
अपनी पावन पृष्ठभूमि
अपनी गहराईयां
व्यक्ति का उथलापन
ले डूबा शब्द शास्वतता
अब शब्द नहीं
व्यक्ति दिखता शब्द कहते
कंठ से कहे शब्द
हृदय का भेद नहीं कहते
हृदय की गहराई बसे शब्द
कंठ तक नहीं आते
अजीब है जीवन
शब्दों से स्वार्थ साधना
बहुत हुआ
ओर शब्द मोहताज है
व्यक्ति के।
छगन लाल गर्ग।

Friday, January 15, 2016

ढलती है शाम।

ढलती है शाम
हर सुबह की
अंश जुडाव बना दिवस का
विभक्त हुआ हर अंश
बिंब उभर आकार पाता
दिवस
नही समता पाते
अंश समय
विभिन्नता देती बोध
अनुभव की शास्वतता
कि बहुआयामी अस्तित्व
पहचान पाये जीवन
हर पल दिन का
अनुभूत क्षणों का
व्यतीत होता
परिणामो का
हिसाब तोलता
भविष्य संवारने निमित्त
ओर भावी छिपा संध्या के
गहन अंधकार बीच
दुख की गहन रजनी
आवरण ढकती जाती
हर परिणामों पर
झीने पर्दे की कालिमा
शून्यता भरती हर उपलब्धि पर
रोशनी कतरों की आस
समय चाहती
नवल प्रभात विकसित
होता स्वयं नष्ट होने पर
दर्द समेटे
रजनी दर्द भोगती
 पीडामय वक्त का
ओर मिटती रहती प्रतिपल
निखरना होता वक्त पर
नहीं परिणाम देते सहारा
सत्य भविष्य मे नही
हर पल सत्य बना
जो है जीवंत
शाम का ढलना भी
है संध्या का आमंत्रण
रजनी का अस्तित्व
प्रभात का बीज बनता
शास्वत जीवन
इसी बीच
वक्त का खेल खेलता
और नित
ढलती है शाम।
छगन लाल गर्ग।






थक गया हूँ।

रहते नहीं बस मे कभी
उपाय कर चुका सभी
झील की गहराई कभी
आत्मसात करो दंभी।
              जानता चित सूने रहे हो
              मानता भीअकेले नहीं हो
             ओर भी पीर पाये मिले हो
             दर्द बांटते तुम जीते रहे हो।
भावना का राग भी क्या
संभावना की आस लाया
नेह दीदार ना हो तो क्या
भरोसे का हृदय तो पाया।
             स्वार्थ साधा स्वार्थ तोला
             लिपट नेह रूप स्पर्श खेला
             चाहत तृप्ति जोखिम झेला
            निस्सार था सब आज तोला।
तनिक विराग दे दो थक गया हूँ
सभी भार दे दो पूर्ण ढक गया हूँ
लब बोल दे दो सब भूल गया हूँ
रब उर्ध्व लहर बही डूब गया हूँ।
            तुम आये भी क्या रजनी बनकर
           अंधकार मे भी गहन रात बनकर
           चेतन प्राण राग विराग सा बनकर
           पलक विरह अनंत मे स्वप्न बनकर।
खोया राग कंठ सूखा है गाने गीत फिर आया हूँ
रोया आंसूँ रहा कहां नीर गहरी पीडा ले आया हूँ
बोया बीज संवेदना गहरा अंकुर लेकर आया हूँ
सोया रहा घनी वासना उन्माद ले फिर आया हूँ।।
छगन लाल गर्ग।



पल स्पंदन।

विराग राग प्रवाह अचेतन छाया
नयन छलकते नेह उफान लाया
ललक हृदय भटकी भंवर भाया
चिराग बुझे अभिशाप संग लाया।
                   उदभ्रांत जीवन पावन ठौर चाहता
                   निष्ठुर शलभ मय जलन प्राण पाता
                   पवन भटकन विवर विश्राम चाहता
                   सरित वेग सा पयोधि विलय चाहता।
मुस्कान संकेत नभ नीरव देता
गहन अंतराल है भ्रमित करता
अदृश्य राह पदचिन्ह नहीं पाता
जड देह पवन सम पहूंच न पाता।
                   विरह जलन विकल तपन हुई रे
                   धधकते प्राण ज्वलशील चित रे
                   छली निर्मोही से नेह दीप जला रे
                   रश्मि पूंज बिखरता प्राण जला रे।
छगन लाल गर्ग।


Thursday, January 14, 2016

आओ ना।

आओ ना
एक राग हो ले
मन का कुछ मान रख ले
अनचाही यादों के घेरे
कुछ पल विस्मृत कर जी ले
देखो ना नभ घना है निखरा
सौन्दर्य उकेरता इठलाता लगता
हलचल बदरी देती इशारे
मुस्कान जादू बिखेरती जाती
लुकाछिपी का खेल भरमाता
आओ ना हम भी जी भरमा ले
देखो वही रूकी देखती
नजर मिलते ही मिटती बिखरती
उमड घुमड इठलाती जाती
आओ ना इसे हम चित मे भर ले
देखो तो वह उषा सुकुमारी
अंबर इठलाये प्राची किनारे
अरूण आभामय आनन मुस्काये
भर भर लायी लालिमा नशिला प्याला
खोलो ना अधर हम रसपान कर ले
पवन हिलोरे लेती गाती उषा
सौन्दर्य नशा बरसाती जाती
सौन्दर्य अस्तित्व खोते जाते
तारागण अपनी देह छिपाते
विकल हुए अब रजनी के संग
छिपते छिपाते हमे भरमाते
मादक मृदुल संगीत उकेरे
उषा वयसंधि गीत सुनाती
यौवन लहर अब सुरभि भर भर
रश्मियों संग हम पर बिखराती
यौवन भरी रश्मियां बाला
दिनकर प्रिय अनुराग लिए
मुकुल नवल रस गागर लाती
पवन संग ले इठलाये रश्मि
तम विनाश हर्ष मनाती
लो लतिका ने लहराया अंचल
उघडा रे नवनीत सौन्दर्य
मादकता बन बहता दरिया
देखो ना मदभरा लावण्य अलौकिक
रश्मियों के घिरी जाल मे
उषा अपना रूप लजाये
कलरव करते पंछी आये
गीत प्रभात नवेले गाते
आशाओं का राग भरा रे
आओ ना प्रियतम आई बेला
स्नेह सुंदरी आंगन घेरे
आओ ना अब एक राग हो ले।
छगन लाल गर्ग।



कुछ कहो।

कुछ कहो तो
अपनापन
कि लगे मेरे हो
नहीं पाता आत्मियता
चौराहे सा बना
हर कोई रूकता
पल भर
पकडता अपनी राह
रह जाता खाली
नहीं लेता कोई ठाह
भीतर की
कदमों की चौट झेलता
दिखाता रहता राह
कि बढें अपनी गरज
नहीं समझ सका
मनुष्य होना भी
दुर्लभता का राग
सुना
देह मानव पाना
संवेदना बहती अपनत्व की
पर  किस राह
चौराहा ही रहा
राह नहीं
कि आस लिए बढूं
सहारा मिले
मानवता का
एक असीम उजाड
विराना घेरता
रात बनी अधिक काली
मेरे अपने
इस विरानी मे
झलक दो ना
कुछ कहो।
छगन लाल गर्ग।

अहंकार घाव।

बदल चुका
भावनाओं का मूल्य
तर्कों के पक्के इरादें
साक्ष्य देते
सचेत हुआ जिता
मनुष्यता
असीम नहीं कुछ भी
विवेक जिने लगा
सार हीन पाता
भावनाओं मे जिना
अनंत है सुख
विवेक रहते
यह अलगाव का धुआं
मुझे नहीं छूता
कर सकता हूँ विश्लेषण
जिन्दगी तेरा
सूखता नहीं कभी
रहता हूँ हरा भरा
बस थोडा सा
तरीका पा गया
तुझे जिने का जिन्दगी
नहीं करता
आत्मावलोकन अपना कभी
शास्त्रों मे रमता
सिद्धांत देता समीक्षा करता
पाता जाता जिंदगी तुझे
ओरों की तरह
सामान्य नहीं रहा
नहीं उठती कभी
भीतरी आनंद की उर्मी
लोभ मोह
बन चुके मेरे आत्मीय
प्रेमी भी
स्वत: स्फुरण नेह नहीं पाता
ठावस मेरे चित
विशिष्ट हूँ मैं
प्रकृति सौन्दर्य की आशक्ति
रहती कोसो दूर मुझसे
सारा सौन्दर्य
पाता हूँ निज अहंकार मे
बस तडप तभी पाता
जब कोई निकलता आगे
विवेक की राह
तभी लगता अब नहीं रहा
मानव
हो चुका आम आदमी।
छगन लाल गर्ग।




Wednesday, January 13, 2016

सुनते हो।

देता हूँ आवाज तुम्हें
अकेलेपन की नीरवता बीच
चेतन आकार नहीं पाता
भाव लिप्त शब्दों की पुकार
सुनते हो तुम
नहीं भीगता हृदय
मत बनो निर्दय इतने
घने अंधकार का
बिंब नहीं त्यागता मुझे
समाऊ  शून्य मे कि
 सुनो ना आवाज मेरी
वही तो देता हूँ स्वर
जो भाते रहे कभी
अंतर केवल यह
कि अब नहीं होता स्वर
रूंघता है गला
शब्द स्फूटन नही लेते
प्राण राग उकेरता जाता
सुनते हो
नहीं उठा पाता दृष्टि
उर्ध्व अनंत बना
कहां ढूंढ पाऊंगा
निर्झर बनी नयन
उजाले स्वप्न बन छितरे मुझसे
धुंधलका घना
नहीं आस की रश्मियां
नहीं पाता पदचिन्ह
केवल तुम्हारी चेतना मे
हुआ अधिक अचेतन
शब्द वे पाऊं कैसे
जो पहूंचे तुम तक
अब मेरा सामर्थ्य मात्र
प्राणों के रुदन स्वर
सुनते हो
मत रूठो इतने मुझसे
कि सारे विभाव
हो जाये विलिन धूल मे
कहां हो तुम
परमात्मा की तरह
मायिक छलावा दिये
भंवर मत छोडो
आओ ना
संकेत बनकर
कि अदृश्य मे अदृश्य बन
निहारू तुम्हें
अपनेपन की गहरी टीस
मौन पर करूण पुकार
सुनते हो।
छगन लाल गर्ग।





जीने लगा।

जीने लगा
असीम कामना
उठता जाता कसमसाहट लिए
वासना का धुआं
गहन अभिप्शा मिलती
धुऐ संग
ओर
करती रहती अस्तित्व
दागित
कलुषता घिरती जीवन
नहीं दमन कर पाता
शात्विक सदाचार
युग की मनमोहिनी सभ्यता रहते
नहीं पाता
अनंत मे कहीं ठौर
कि ठहरू
और लू बोध
समय की दौडती रफ्तार का
जहां अदृश्य बना सत्य
पुकारता जाता
भीतर की
आत्म प्रवंचना का राज
दृश्य यथार्थ का
मोहक अंदाज
नहीं चाहता विलगता
वासनाओ से
जहां नित खिलते
मादक सौन्दर्य लिए फुल
कामनाओ के
नवीनता बन चुकी
आकर्षण जीवन का
मोहक अदाएं
संकेत देती अभिसार का
होता रहता आशक्त
आशक्त दृश्य नहीं होता
कभी अपना
सत्य अज्ञात रहता
ओर पाता जाता
असीम अतृप्ति की वेदना
अप्राप्ति का दर्द
हुआ जाता
जीवन का विकल बोझ
यह दर्दनाक मोहित जिन्दगी
कैसे कहूं नेह भरी
जिसमे बहुत गहरे
छिपा दबा
वासना का कीडा
कुलबुलाहट करता
ओर देता जाता अभिव्यक्ति
 प्रेमिल अभिव्यंञ्जना
शास्वत शब्दों सहारे
भावनामय प्रणय राग
कारण की मंजिल तक
फिर वही
अतृप्ति का राग जीवन का
अनंत की चाह
लेता उडान
जिन्दगी चाहों के घनत्व बीच
निज व्यक्तित्व का सार
होता जाता ओझल
तमाशा बनी जिन्दगी
खेलती जाती खेल
बन वासना की कठपुतली
असलियत तेरी समझू कि
सरकती जाती
समय के अंधेरे विवर की ओर।
छगन लाल गर्ग।







Tuesday, January 12, 2016

परिमार्जित नेह।

आत्मीय धरातल
नेह बन जाता पावन
समरसता लिए
बहाव पाता
स्वच्छ निर्मल समतल
नही होता
उतार चढाव
एकरस मे समाहित
होते रहते
जीवन व्याप्त सारे रस
यह भी सत्य
सौन्दर्य रस का लावण्य
समाता पल्लवन पाता
कमल कीचड मे
गंदले नीर का
करता जाता पोषण
अपने अस्तित्व निमित्त
पर करता जाता
अपनी प्रवृति सम
परिमार्जन
पावनता नीर संश्लेषण कर
करता ग्रहण
देता सौन्दर्य सुरभि अपरिमित
साबित होती
सौन्दर्य अलौकिक गरिमा
समझ आता नीर का
होना उसकी लावण्यता मे
उन्माद देता
विमोहित करता सौन्दर्य
पर नही भूलता
पृष्ठभूमि उसकी
कीचड
हर सौन्दर्य अंकुर लेता
निम्नता तले
ठीक विमल नेह सा
कि हर पावन प्रेम
पृष्ठभूमि पाता वासना से
अंकुर फूटते वहीं
ओर लेता आकार
परिमार्जित हुआ नीर प्रवृति
पावन गरिमा पाता
स्फूटन अंकुर बनते
गहन विश्वास आस्था के
एकरसता के खिलते फूल
सौन्दर्य की घनीभूत
ऊर्जा लिए
मिट मिट जाता
कलुषता का कीचड
ओर यही नेह
बन जाता प्रार्थना
अलौकिक की।
छगन लाल गर्ग।

सर्द झौका।

सर्द झौकें
कर जाते हो
प्रवेश बंद कमरे भी
आत्मसात हुआ तुमसे
हर पल
जीता जाता ठिठुरन तुम्हारी
निगाहें उठाये
करता पुनरार्वलोकन
कमरे का
ढूंढता जगह
जहां से करते हो प्रवेश
नहीं पाता कोई छिद्र
केवल देते अहसास
ठिठूरन लिए
अभावों की तरह
हर प्रयास सक्रिय हुआ
करने पर नहीं जाता
अभावों का सिलसिला
तुम्हारी तरह
तुम रहोगे
साबित हुआ अस्तित्व तुम्हारा
तुम्हारी छाया कंपन देती
तन भी मन भी
होता जाता व्याकुल
देखो ना बाहर
सूर्य की रश्मियां
घूली मिली लगती
अंग तुम्हारे
बना देते हो मौन समझौता
मेरी तरह
कि जी सकू झेले अभाव
श्वास लेने खातिर
नहीं छूटता मोह
अभाव जीती जिन्दगी से
महसूस करता
मै तुम्हे
भीतर चलती
धडकनों की तरह
निकलता नित्य बाहर
जीवन रश्मियों की तलाश
रिक्तता लिए
किरणों के जाल बीच
हटा दिया जाता
गेरों की तरह
लेते घेरते समर्थ असीम जगह
नहीं पाता अपनी ठौर
जीने लायक उष्मा पाया
लौटा हूँ
थोडा ही सही
अच्छापन तेरा महसूसता हूँ
तनिक जीवन की ऊर्जा पाया
ठीक आंखों मे ठहरी
काजल की तरह
नही रही शिकायत
ठिठुरन तुमसे
घने है संगी साथी
मेरी तरह
मजबूर है झेलने को
ठिठुरती जिन्दगी
ओर आंशिक ही सही
पाते रहते
अस्फुट आंतरिक रस तेरा।
छगन लाल गर्ग।

Monday, January 11, 2016

मन मेरे।

मन मेरे
मानो ना कहना
मत भरो मन अपने
ऊंची उडान
नहीं बचा सामर्थ्य
कि कर पाऊं तुम्हारा साथ
जल उठा
जिन्दगी की नित आती
श्वासो की रफ्तार
देती जाती
नित दम घौटू धुआं
संघर्ष करता जाता
जिन्दा रहने का
और तुम
फिसलती जाती हर बार
चमकते सितारों की तरफ
यह जानते बूझते भी
की अति बौने
अस्तित्व लिए
भरता यदि उडान
नहीं बच सकता
गिरता ही नहीं
खो देता अमूल्य कहाता
यह जीवन
छोडो मुझे नही चाहता
अकाल मृत्यु
जीने दो ना
इसी तरह सामान्य सा
सुनते हो मन मेरे
कहा मेरा
असलियत जीने दो
रह सकू आम आदमी।
छगन लाल गर्ग।

फिर नहीं।

अनहोनी नही जीवन
चाहत लेती आकार
मेरे निमित्त
कि लहलहा उठे उपवन
जीवन का
आती अनहोनी भी
पर नहीं होती अपनी
परायापन की प्रवृत्ति
उसकी संपति
वही लाती
ओर कर जाती
जीवन संताप
कि स्मृति रहे तो मात्र
व्याकुल करती रहे
जीवन भर
ओर जीना
सरकता रहा भार हुआ
आखिर कतरा उठा हूँ मै
कि अनहोनी
त्रासदी झेलता यह जीवन
नही चाहता आये
मुझ तक
फिर नही।
छगन लाल गर्ग।