हिसाब से जीता हूँ
जिन्दगी तुझे
नहीं देता पहचान
भीतर भरी
बहुत संभलता हूँ
हर कदम रखते
बिल्कुल गणित लिए
सब देखता जाता
विवेक के बल
नहीं भीगने देता
कोई कोना तन का
कि लिपटे गंदगी
और संवेदना
शब्द ही निकाल फैंका
कौशो दूर
अब आराम है
साफ सुथरापन महसूसता
जीने लगा हूँ
नहीं पसंद
किसी गंदले रेंगते आदमी को
देखना
हटा देता हूँ न आये सामने
अब मिली पहचान
अर्थ समझते ही
वर्ग का हिसाब
भरापन आया हिसाब से
जाते ही संवेदना
आखिर सलिका आ गया
सभ्य जीवन का।
छगन लाल गर्ग।
जिन्दगी तुझे
नहीं देता पहचान
भीतर भरी
बहुत संभलता हूँ
हर कदम रखते
बिल्कुल गणित लिए
सब देखता जाता
विवेक के बल
नहीं भीगने देता
कोई कोना तन का
कि लिपटे गंदगी
और संवेदना
शब्द ही निकाल फैंका
कौशो दूर
अब आराम है
साफ सुथरापन महसूसता
जीने लगा हूँ
नहीं पसंद
किसी गंदले रेंगते आदमी को
देखना
हटा देता हूँ न आये सामने
अब मिली पहचान
अर्थ समझते ही
वर्ग का हिसाब
भरापन आया हिसाब से
जाते ही संवेदना
आखिर सलिका आ गया
सभ्य जीवन का।
छगन लाल गर्ग।