Sunday, January 24, 2016

आत्मावलोकन।

बाहरी जीवन जीया अतिशय
नहीं मिलता फुर्सत का समय
आवश्यकता होती पाता संचय
कि आत्मसात करू बाह्य स्वयं ।
अनुभूत पल कब अपने रहे
समय संग अपरिपक्व रहे
परिपक्वता मे दमन हो बहे
जीवन मे वितृष्णा शाप रहे।
निष्ठूर स्वप्न नहीं  देते रस
स्वार्थमय अपनत्व  निरस
झाके अभिसार लगे सरस
अंत परिणाम दर्द हूँ विवस।
चमत्कार नहीं जीवन
कर्ममय अभिनय लीन
रीतने मे गागर तल्लीन
चेतना ही रश्मि किरन।
बीतता हर पल लाता अवबोध
किनारा विषम त्याग तू अबोध
लहरे अनंत उठी दे संकेत बोध
प्राण तत्व नहीं भौतिक अबोध ।
ज्वलन पाते जीवन गुजरा
हर पल चिन्ताओ का घेरा
राग द्वेष संग्रह दौडा फिरा
मोह मृगतृष्णा मे तेरा डेरा ।
नहीं नहीं निस्सार नाहक
पाया अनपाया हैं भ्रामक
नहीं तेरा कभी रहे नाहक
जाल लिपटा त्याग दायक।
चल कुछ मन का मान कर ले
भाव भीतर सार मंथन कर ले
निर्लिप्त रहना समझ सार ले ले
कर्म जीवन शास्वत पहचान ले।।
छगन लाल गर्ग।