Saturday, January 23, 2016

विराने का कोलाहल।

असत्य नहीं विराना
रूप बदलता सूझ लेता
नव प्रेरणा जीने की
समय व्याप्त सत्य तले
अब नहीं रहा विराना
सवेरे भ्रमण दौरान
जहां पसरे थे कूडें के ढेर
ले चुके शक्ल अब
टाट निर्मित झौपडियों के
अब नहीं रहा
सडक का किनारा खाली
जहां नीम का सूखा तना
थके कदमों को देता था सहारा
बैठता था उस पर
पा लेता ऊर्जा
कदमों की
अब उसी पर अधनंगे बच्चे
खेलते लुका चुप्पी
रूकना बेअर्थ समझ
बढता हूँ आगे
ठौर ढूँढता विश्राम
पर बच्चों की आवाज दबाती
सुनता हूँ कर्कश हमलेवर आवाज
रूकता देखता पीछे
पीटती जाती औरत
अपने ही मर्द से
समझ नहीं पाता रिस्तों का
यह रूप
मार खाती पत्नी करती जाती हमला
दुर्बल शरीर ओर ताकतवर गालियों से
नहीं फर्क महसूसता
संस्कृति ओर संस्कार बीच
सभ्य संस्कृति मौन पर दारूण
करती आक्रमण
ओर संस्कार बिना लाग लपट
विभत्स होते साकार।
छगन लाल गर्ग।