Sunday, January 31, 2016

अभिव्यक्ति का खतरा।

मंजन करना होता
अभिव्यक्ति देने से पहले
हर कथन
कहना होता परिमार्जित
किसी भी शैली के रहते
हर शात्विक अनुभूति
नहीं बन सकती अभिव्यक्ति
होना होता विवश
भीतर ही भीतर संश्लेषण करने
शब्दों ओर भावों की
सामजस्यता बीच
खो जाते मूल प्राण अभिव्यक्ति के
ओर कथन बन जाता
चमक देता खोखला सा
नहीं भीतर सार रखता महत्व
शब्द चित्र हो उठते
आकार लेते
छीपी भीतरी वासनाओ की
बोलती तस्वीर
अच्छा लगता मन माफिक
परोसा शब्द जाल
अनंत कहां हैं
अब हृदय भीतर
कि टटोल सके शास्वत सत्य
अभिव्यक्ति मे
बहुत हुआ सृजन
अब रहने दो यह सब
होने दो
द्विअर्थी चमत्कार
रस भी रसाकार भी
हो जाने दो संपूर्ण
कि प्यास पीती रहे
अंत तक
अतृप्ति की आग को
भ्रमित रसागार बन
ओर अभिव्यक्ति बदले
मेरी तृप्ति के राग बनकर
कि जीऊ निरंतर
शरीर सा मन बनकर
हैं यदि खतरा
अभिव्यक्ति का
मंजन करते रहो भावो को
शब्द देकर
आखिर रसास्वादन निमित्त
जिन्दगी बने
ओर यह दायित्व निभाना
भी सृजन का आयाम हैं ।
छगन लाल गर्ग।