Sunday, January 31, 2016

कुंठित हैं धुऑ।

  सचेतन दागित पदार्थ
 देता संघर्ष मय अंधेरा
ज्वलित पदार्थ नहीं पीघल पाता
कि ले सके आकार
निष्क्रिय राख का
धधकती चिंगारी चाहती विनाश
प्रज्वलन होता ले आकार
अनिष्ट अतिचारो की राख
यही सत्य भूमा का
स्वीकृति लिए
जीती रही मानव संस्कृति
परंतु युग सत्य
चाहता बदलाव
 मूल्यों ओर आस्थाओ मे
नवीन मूल्य
अधिक कसे जा चुके
तर्क मयी कसौटी पर
नहीं रहा संचय
झूठला दी गई मान्यताऐ
नहीं चलेगी
तोडना होगा अंधा मोह
परंपरा का
पहचानी सी असली मानवता
विशुद्ध हृदय लिए
मौन मूक देती
मानव होने की असलियत
गिरे पर्दे अचेतना के
मत उठाओ
अन्यथा अर्से से
ज्वलित कामनाओ का धुऑ
कुंठित हैं घना
नहीं ले सकोगे फिर
जिन्दगी की श्वासे
कडवाहट बन चुकी विष तुल्य
समझो अंतिम सत्य
हैं स्पष्ट समझने लायक
कुंठित हैं धुऑ।
छगन लाल गर्ग।