Wednesday, January 13, 2016

सुनते हो।

देता हूँ आवाज तुम्हें
अकेलेपन की नीरवता बीच
चेतन आकार नहीं पाता
भाव लिप्त शब्दों की पुकार
सुनते हो तुम
नहीं भीगता हृदय
मत बनो निर्दय इतने
घने अंधकार का
बिंब नहीं त्यागता मुझे
समाऊ  शून्य मे कि
 सुनो ना आवाज मेरी
वही तो देता हूँ स्वर
जो भाते रहे कभी
अंतर केवल यह
कि अब नहीं होता स्वर
रूंघता है गला
शब्द स्फूटन नही लेते
प्राण राग उकेरता जाता
सुनते हो
नहीं उठा पाता दृष्टि
उर्ध्व अनंत बना
कहां ढूंढ पाऊंगा
निर्झर बनी नयन
उजाले स्वप्न बन छितरे मुझसे
धुंधलका घना
नहीं आस की रश्मियां
नहीं पाता पदचिन्ह
केवल तुम्हारी चेतना मे
हुआ अधिक अचेतन
शब्द वे पाऊं कैसे
जो पहूंचे तुम तक
अब मेरा सामर्थ्य मात्र
प्राणों के रुदन स्वर
सुनते हो
मत रूठो इतने मुझसे
कि सारे विभाव
हो जाये विलिन धूल मे
कहां हो तुम
परमात्मा की तरह
मायिक छलावा दिये
भंवर मत छोडो
आओ ना
संकेत बनकर
कि अदृश्य मे अदृश्य बन
निहारू तुम्हें
अपनेपन की गहरी टीस
मौन पर करूण पुकार
सुनते हो।
छगन लाल गर्ग।