Sunday, January 24, 2016

चुभते क्षण।

बढ़ती जाती चुभन
काटते हैं मच्छर
उखडी हुई सडको पर
पानी का बहाव
रूकता रहता
गंदगी घूला पानी
जगह जगह बनता जाता ताल
कि चलना ओर गिरना
दोनों रहते साथ साथ
संभाले कदम
अनायास अनुभव हीनता से
गचका खाते
ओर मटमेले पानी से
हो जाता सारोबार
नहीं रूकता ऑफिस का काम
ओर बदलते कपडो का सपना लिए
निकलता उसी रंग प्रकृति बख्शा
लिए गंदगी प्रवेश करता
ऑफिस
सुखाता रहता गंदगी तन के साथ
यह नजारा बरसात का नहीं
आम दिनों का
गंदी नालियो का स्थानांतरण हुआ
सडको मे
ओर आती रात
बढ़ाती चिन्ता मच्छरो की
काटते जाते चूसते रक्त
सुना इस बार
व्यवस्था करवट लेंगी
निर्णायक सरकार का राज
करिश्मा करेगा
आंदोलन की तरह बहुआयामी
कानून लाये जाएंगे
ओर अच्छे दिन आ जाएंगे ।
छगन लाल गर्ग।