Friday, January 29, 2016

शिक्षक का छाया।

  अब मत कह देना
 शिक्षक होते भी
गरिमा नहीं जानता अपनी
जानता हूँ बेहतर
नहीं चूकता कोई अवसर
जहाँ देखे मेरे
कोई कर सके जुर्रत घर मे
मर्यादा भंग
या अनुशासन हीन आचरण के
ले सके कदम
रिटायर होते ही
परेशान हैं बैचारे
नहीं चाहता कोई फालतू
रूके घर
सब निकल पड़ते
किसी न किसी काम पर
हमारा बेरोजगार लवली पुत्र भी
अब कहां रहता घर
मेरे घर आते ही
लगा काम पर
अब क्या करे
अकेले  हैं
पत्नी से नहीं बनती
सुना हैं
जब से
कि मैं प्राइवेट काम पर
जाऊँगा
सभी खुश हुए मेरी
सेवा बढा दी हैं
अब समझना रखता हूँ
बाकी
कारण नहीं कहूँगा
शिक्षक की गरिमा
आडे आती हैं ।
छगन लाल गर्ग।