Monday, January 25, 2016

कहो ना मन।

  कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
उठते उन्माद पल का भाव
निहारते अपलक नयनो का अनुराग
भटकते भावों का विराम
स्पंदित धड़कनो का राग
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
सलज्ज मुस्कान सिहरन तरंग
चीर देती हृदय व्याकुल प्राण
अदृश्य कामनाऐ बहती अविराम
चेतना को देती विराम
हर लावण्य रश्मि समाती अविरल
हृदय जगत मचती भूचाल
नयन थकते रूप मदिरा
रश्मि संग पान करते
नहीं मन तू वस होता मेरे
अस्तित्व संग ले विलय पाता
सौन्दर्य तनी चेतना के
छाये मे विश्राम पाता
नहीं समझ पाऊ रे मन अब
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार
ललक लालिमा लावण्य मद
इतराता सौन्दर्य देह बना
अंतराल हृदय देह बीच विकट
नहीं साम्य झलक मिलती कहीं
रूक ना निहार तो समता का
मापक तुला कहीं दिखती नहीं
अचकचा तो थोड़ा रूक जरा
नश्वरता भी आक जरा
भीतर भाव विमल रस चख
चेतन तत्व अंकुर उठे
प्रथम सीढ़ी मत आहत बन
अलौकिक सौन्दर्य सृजक निहार
परम सौन्दर्य कोष वहीं
हृदय मे रस स्त्रोत यही
उस स्त्रोत को व्यर्थ बर्बाद न कर
सार यही से बहता रे मन
अब तो
कहो ना मन
सौन्दर्य का सार।
छगन लाल गर्ग।