बदल चुका
भावनाओं का मूल्य
तर्कों के पक्के इरादें
साक्ष्य देते
सचेत हुआ जिता
मनुष्यता
असीम नहीं कुछ भी
विवेक जिने लगा
सार हीन पाता
भावनाओं मे जिना
अनंत है सुख
विवेक रहते
यह अलगाव का धुआं
मुझे नहीं छूता
कर सकता हूँ विश्लेषण
जिन्दगी तेरा
सूखता नहीं कभी
रहता हूँ हरा भरा
बस थोडा सा
तरीका पा गया
तुझे जिने का जिन्दगी
नहीं करता
आत्मावलोकन अपना कभी
शास्त्रों मे रमता
सिद्धांत देता समीक्षा करता
पाता जाता जिंदगी तुझे
ओरों की तरह
सामान्य नहीं रहा
नहीं उठती कभी
भीतरी आनंद की उर्मी
लोभ मोह
बन चुके मेरे आत्मीय
प्रेमी भी
स्वत: स्फुरण नेह नहीं पाता
ठावस मेरे चित
विशिष्ट हूँ मैं
प्रकृति सौन्दर्य की आशक्ति
रहती कोसो दूर मुझसे
सारा सौन्दर्य
पाता हूँ निज अहंकार मे
बस तडप तभी पाता
जब कोई निकलता आगे
विवेक की राह
तभी लगता अब नहीं रहा
मानव
हो चुका आम आदमी।
छगन लाल गर्ग।
भावनाओं का मूल्य
तर्कों के पक्के इरादें
साक्ष्य देते
सचेत हुआ जिता
मनुष्यता
असीम नहीं कुछ भी
विवेक जिने लगा
सार हीन पाता
भावनाओं मे जिना
अनंत है सुख
विवेक रहते
यह अलगाव का धुआं
मुझे नहीं छूता
कर सकता हूँ विश्लेषण
जिन्दगी तेरा
सूखता नहीं कभी
रहता हूँ हरा भरा
बस थोडा सा
तरीका पा गया
तुझे जिने का जिन्दगी
नहीं करता
आत्मावलोकन अपना कभी
शास्त्रों मे रमता
सिद्धांत देता समीक्षा करता
पाता जाता जिंदगी तुझे
ओरों की तरह
सामान्य नहीं रहा
नहीं उठती कभी
भीतरी आनंद की उर्मी
लोभ मोह
बन चुके मेरे आत्मीय
प्रेमी भी
स्वत: स्फुरण नेह नहीं पाता
ठावस मेरे चित
विशिष्ट हूँ मैं
प्रकृति सौन्दर्य की आशक्ति
रहती कोसो दूर मुझसे
सारा सौन्दर्य
पाता हूँ निज अहंकार मे
बस तडप तभी पाता
जब कोई निकलता आगे
विवेक की राह
तभी लगता अब नहीं रहा
मानव
हो चुका आम आदमी।
छगन लाल गर्ग।