विराग राग प्रवाह अचेतन छाया
नयन छलकते नेह उफान लाया
ललक हृदय भटकी भंवर भाया
चिराग बुझे अभिशाप संग लाया।
उदभ्रांत जीवन पावन ठौर चाहता
निष्ठुर शलभ मय जलन प्राण पाता
पवन भटकन विवर विश्राम चाहता
सरित वेग सा पयोधि विलय चाहता।
मुस्कान संकेत नभ नीरव देता
गहन अंतराल है भ्रमित करता
अदृश्य राह पदचिन्ह नहीं पाता
जड देह पवन सम पहूंच न पाता।
विरह जलन विकल तपन हुई रे
धधकते प्राण ज्वलशील चित रे
छली निर्मोही से नेह दीप जला रे
रश्मि पूंज बिखरता प्राण जला रे।
छगन लाल गर्ग।
नयन छलकते नेह उफान लाया
ललक हृदय भटकी भंवर भाया
चिराग बुझे अभिशाप संग लाया।
उदभ्रांत जीवन पावन ठौर चाहता
निष्ठुर शलभ मय जलन प्राण पाता
पवन भटकन विवर विश्राम चाहता
सरित वेग सा पयोधि विलय चाहता।
मुस्कान संकेत नभ नीरव देता
गहन अंतराल है भ्रमित करता
अदृश्य राह पदचिन्ह नहीं पाता
जड देह पवन सम पहूंच न पाता।
विरह जलन विकल तपन हुई रे
धधकते प्राण ज्वलशील चित रे
छली निर्मोही से नेह दीप जला रे
रश्मि पूंज बिखरता प्राण जला रे।
छगन लाल गर्ग।