कुछ कहो तो
अपनापन
कि लगे मेरे हो
नहीं पाता आत्मियता
चौराहे सा बना
हर कोई रूकता
पल भर
पकडता अपनी राह
रह जाता खाली
नहीं लेता कोई ठाह
भीतर की
कदमों की चौट झेलता
दिखाता रहता राह
कि बढें अपनी गरज
नहीं समझ सका
मनुष्य होना भी
दुर्लभता का राग
सुना
देह मानव पाना
संवेदना बहती अपनत्व की
पर किस राह
चौराहा ही रहा
राह नहीं
कि आस लिए बढूं
सहारा मिले
मानवता का
एक असीम उजाड
विराना घेरता
रात बनी अधिक काली
मेरे अपने
इस विरानी मे
झलक दो ना
कुछ कहो।
छगन लाल गर्ग।
अपनापन
कि लगे मेरे हो
नहीं पाता आत्मियता
चौराहे सा बना
हर कोई रूकता
पल भर
पकडता अपनी राह
रह जाता खाली
नहीं लेता कोई ठाह
भीतर की
कदमों की चौट झेलता
दिखाता रहता राह
कि बढें अपनी गरज
नहीं समझ सका
मनुष्य होना भी
दुर्लभता का राग
सुना
देह मानव पाना
संवेदना बहती अपनत्व की
पर किस राह
चौराहा ही रहा
राह नहीं
कि आस लिए बढूं
सहारा मिले
मानवता का
एक असीम उजाड
विराना घेरता
रात बनी अधिक काली
मेरे अपने
इस विरानी मे
झलक दो ना
कुछ कहो।
छगन लाल गर्ग।