Friday, January 22, 2016

आकांक्षा।

नहीं जिंदगी आसान
उलझन देती
हर आकांक्षाओं निमित्त
चाहत का दरिया
लेता जाता हर पल
विशाल आकार
ओर संयोजन पल
भरता जाता हलचल
आकांक्षाओं की भीड
हो जाता बैचैन बिना पाये
मन वांछित
अति गहरे हर आकांक्षा
देती जाती गहन पीडा
सुख की चाह
रखती हल्के पर्दे छिपाये
दर्द भरे जीवन का गात
नहीं आता गणित
ले सकू हिसाब
जीवन चाहे सुखों का
बडी उलझन जीता  हूँ
जिन्दगी तुझे
सुलझाने तूझे
ओर अधिक घीरता जाता
अनजान अंधेरों की खाई
नहीं आकांक्षाओं का जाल
शास्वत
पर भौतिक तृष्णा का मोह
मेरा झुकाव
बढाता जाता उलझाव
ओर नैसर्गिक सत्य
होता जाता दूर
अति दूर
मृग तृष्णा के छाये घेरते
नित जीये जाता
आकांक्षा भरी जिंदगी
नहीं ठौर कहीं
पा सकू मानव होने का
अर्थ।
छगन लाल गर्ग।