तनिक खुशहाली का छाया
पाने की ललक लिए
बढ़ता जाता
गुमसुम सा सोचता जाता
अपना हित
नहीं पता कितना सच
अधूरा अधूरा महसूस करता
स्वयं को
क्या सच क्या झूठ
नहीं पाता अपने भीतर सत्य
कि जीया भी
ठीक ठाक या
कुछ अन्यो का परोसा
जीवन
नहीं याद आता कि
किया हो कभी मन चाहा
एक जिम्मा संभाला
जीता रहा
कि न कहे कोई मुझे
नकारा
वहीं करता जिसे
करना होता अनिवार्य
पारिवारिक निर्देशो के तहत
तभी अब पाता हूँ
जगह परिवार मे होने की
अपनी
साबित होती हैं सदस्यता
हूँ कहां मैं अपना
नहीं कहता कि जीता हूँ खुद
पता नहीं
कितनो की सवारी उठाये
चलती जाती
मेरी जिन्दगी सामर्थ्य लिए
शायद अंतिम बल तक
चलना होगा
इसी तरह संस्कृति की चाल
की रहे अस्मिता
खुद से हुआ गुमसुम
जीना तो हैं ही
गुमनाम ही सही ।
छगन लाल गर्ग।
पाने की ललक लिए
बढ़ता जाता
गुमसुम सा सोचता जाता
अपना हित
नहीं पता कितना सच
अधूरा अधूरा महसूस करता
स्वयं को
क्या सच क्या झूठ
नहीं पाता अपने भीतर सत्य
कि जीया भी
ठीक ठाक या
कुछ अन्यो का परोसा
जीवन
नहीं याद आता कि
किया हो कभी मन चाहा
एक जिम्मा संभाला
जीता रहा
कि न कहे कोई मुझे
नकारा
वहीं करता जिसे
करना होता अनिवार्य
पारिवारिक निर्देशो के तहत
तभी अब पाता हूँ
जगह परिवार मे होने की
अपनी
साबित होती हैं सदस्यता
हूँ कहां मैं अपना
नहीं कहता कि जीता हूँ खुद
पता नहीं
कितनो की सवारी उठाये
चलती जाती
मेरी जिन्दगी सामर्थ्य लिए
शायद अंतिम बल तक
चलना होगा
इसी तरह संस्कृति की चाल
की रहे अस्मिता
खुद से हुआ गुमसुम
जीना तो हैं ही
गुमनाम ही सही ।
छगन लाल गर्ग।