Tuesday, January 12, 2016

परिमार्जित नेह।

आत्मीय धरातल
नेह बन जाता पावन
समरसता लिए
बहाव पाता
स्वच्छ निर्मल समतल
नही होता
उतार चढाव
एकरस मे समाहित
होते रहते
जीवन व्याप्त सारे रस
यह भी सत्य
सौन्दर्य रस का लावण्य
समाता पल्लवन पाता
कमल कीचड मे
गंदले नीर का
करता जाता पोषण
अपने अस्तित्व निमित्त
पर करता जाता
अपनी प्रवृति सम
परिमार्जन
पावनता नीर संश्लेषण कर
करता ग्रहण
देता सौन्दर्य सुरभि अपरिमित
साबित होती
सौन्दर्य अलौकिक गरिमा
समझ आता नीर का
होना उसकी लावण्यता मे
उन्माद देता
विमोहित करता सौन्दर्य
पर नही भूलता
पृष्ठभूमि उसकी
कीचड
हर सौन्दर्य अंकुर लेता
निम्नता तले
ठीक विमल नेह सा
कि हर पावन प्रेम
पृष्ठभूमि पाता वासना से
अंकुर फूटते वहीं
ओर लेता आकार
परिमार्जित हुआ नीर प्रवृति
पावन गरिमा पाता
स्फूटन अंकुर बनते
गहन विश्वास आस्था के
एकरसता के खिलते फूल
सौन्दर्य की घनीभूत
ऊर्जा लिए
मिट मिट जाता
कलुषता का कीचड
ओर यही नेह
बन जाता प्रार्थना
अलौकिक की।
छगन लाल गर्ग।